रूस से ऑनलाइन जुड़ी नीना ने काशी में कराया नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध, पिता एंड्रे समेत रूस-यूक्रेन युद्ध में मृत आत्माओं की शांति और मोक्ष की कामना से हुआ अनुष्ठान
रूस में रहकर मित्र ईन्गा के साथ ऑनलाइन जुड़ी रहीं नीना
प्रतिनिधि के रूप में नीलकान्त दुबे ने काशी में निभाया धार्मिक विधान
रिपोर्ट - ओमकार नाथ
वाराणसी। काशी की आध्यात्मिक परंपराओं और सनातन धर्म की मान्यताओं से प्रभावित होकर रूस की निवासी नीना ने अपने पिता एंड्रे समेत रूस-यूक्रेन युद्ध में मृत आत्माओं की शांति और मोक्ष की कामना से पिशाचमोचन तीर्थ में नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध कराया। रूस में रहते हुए नीना अपनी मित्र ईन्गा के साथ पूरे अनुष्ठान में ऑनलाइन जुड़ी रहीं। वहीं, उनके प्रतिनिधि के रूप में नीलकान्त दुबे ने काशी में मौजूद रहकर धार्मिक विधान संपन्न कराया।
पिशाचमोचन तीर्थ में अमावस्या के अवसर पर हुआ यह अनुष्ठान सुबह 11 बजे शुरू होकर शाम पांच बजे तक चला। वाग्योग चेतनापीठम् के अध्यक्ष एवं सचिव तथा पद्मश्री वागीश शास्त्री के पुत्र पं. आशापति शास्त्री के निर्देशन में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। अनुष्ठान में पहले नारायण बलि और इसके बाद त्रिपिंडी श्राद्ध का कर्म कराया गया।
दो चरणों में संपन्न हुआ अनुष्ठान
धार्मिक विधान के पहले चरण में नारायण बलि का कर्म कराया गया। पं. संजय कुमार उपाध्याय के आचार्यत्व में आचार्य संदीप मिश्र, आचार्य विकास पाण्डेय, नीलकान्त दुबे और आयुष द्विवेदी ने पं. आशापति शास्त्री के निर्देशन में अनुष्ठान पूरा कराया।
इसके बाद दूसरे चरण में त्रिपिंडी श्राद्ध का कर्म संपन्न हुआ। इसमें भी पं. संजय कुमार उपाध्याय के आचार्यत्व में आचार्य संदीप मिश्र, आचार्य विकास पाण्डेय और नीलकान्त दुबे ने धार्मिक प्रक्रिया पूरी कराई। रूस में मौजूद नीना और उनकी मित्र ईन्गा ऑनलाइन माध्यम से पूरे अनुष्ठान से जुड़ी रहीं।
पिछले माह संपर्क कर जताई थी इच्छा
पं. आशापति शास्त्री ने बताया कि नीना ने पिछले माह अपनी रूसी शिष्या ईन्गा के माध्यम से उनसे संपर्क किया था। नीना अपने पिता एंड्रे की आत्मा की शांति के साथ रूस-यूक्रेन युद्ध में मारे गए लोगों की आत्माओं की शांति और मुक्ति के लिए सनातन परंपरा के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान कराना चाहती थीं। उनकी इच्छा के अनुरूप अमावस्या पर पिशाचमोचन तीर्थ में नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध कराया गया।
उन्होंने बताया कि पिशाचमोचन तीर्थ का काशी में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यहां पितरों की शांति और मोक्ष की कामना से विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इसी आस्था के तहत नीना ने रूस में रहते हुए ऑनलाइन माध्यम से काशी के विद्वानों के निर्देशन में अनुष्ठान में सहभागिता की।
80 से अधिक देशों में सनातन परंपरा के प्रसार का दावा
पं. आशापति शास्त्री के अनुसार वाग्योग चेतनापीठम् की स्थापना महामहोपाध्याय भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी ‘वागीश शास्त्री’ ने करीब 46 वर्ष पूर्व की थी। संस्था के माध्यम से 80 से अधिक देशों में सनातन परंपरा, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार का कार्य किया जा रहा है। संस्था से 50 हजार से अधिक अनुयायी जुड़े होने का दावा किया गया है।
रूस की निवासी नीना द्वारा ऑनलाइन माध्यम से काशी में कराया गया यह अनुष्ठान विदेशों में भी काशी की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति रुचि का उदाहरण रहा। भौगोलिक दूरी के बावजूद उन्होंने ऑनलाइन जुड़कर अपने पिता सहित युद्ध में मृत लोगों की आत्माओं की शांति और मोक्ष की कामना की।