नाटी इमली का भरत मिलाप : 14 वर्षों के विरह के बाद चारों भाइयों का मिलन देखने उमड़ा जनसैलाब, अद्भुत लीला देखकर अभिभूत हुए एनआरआई और विदेशी
वाराणसी। घड़ी की सुइयां तय मुहूर्त की ओर बढ़ रही थीं। नाटी इमली का ऐतिहासिक मैदान श्रद्धालुओं से खचाखच भरा था। किसी की नजरें पुष्पक विमान पर टिकी थीं तो कोई उस पल का इंतजार कर रहा था, जब बरसों के विरह के बाद चारों भाइयों का मिलन होगा। फिर वह शुभ घड़ी आई, जब पुष्पक विमान रूपी रथ से उतरकर प्रभु श्रीराम ने अपने प्राणप्रिय भरत को हृदय से लगा लिया। देखते ही देखते पूरा परिसर ‘हर-हर महादेव’ और ‘सियावर रामचंद्र की जय’ के उद्घोष से गूंज उठा। आंखों के सामने केवल दो भाइयों का मिलन नहीं था, बल्कि प्रेम, त्याग, समर्पण और मर्यादा की वह तस्वीर थी, जिसे देखने के लिए काशी की धरती हर साल उमड़ पड़ती है।
महज 3 मिनट 36 सेकंड का यह महामिलन अपने भीतर सदियों की आस्था समेटे है। कुछ ही क्षणों में राम और भरत के गले मिलने का दृश्य लाखों दिलों में उतर गया। किसी ने हाथ जोड़कर प्रभु को नमन किया तो किसी की आंखें भावुकता से नम हो गईं। नाटी इमली से जैतपुरा, लोहटिया और मैदागिन तक श्रद्धालुओं का रेला नजर आया। भरत मिलाप की लीला देखने एनआरआई और विदेशी भी पहुंचे। राम और भरत के मिलन के प्रसंग का जीवंत मंचन देखकर अभिभूत नजर आए।
भरत मिलाप की लीला में समाई सदियों की आस्था
चित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक पं. मुकुंद उपाध्याय बताते हैं कि काशी की यह विश्वप्रसिद्ध लीला 483 वर्ष पुरानी है। संत मेघा भगत द्वारा स्थापित इस परंपरा को सदियों से उसी शुद्धता और मर्यादा के साथ निभाया जा रहा है। इसकी विशेषता केवल राम-भरत का मिलन नहीं, बल्कि वह अनुशासन और साधना है, जिसके साथ इस क्षण को साकार किया जाता है।
लीला का समय भले ही चंद मिनटों का हो, लेकिन इसकी प्रतीक्षा पूरे वर्ष रहती है। यहां राम और भरत का मिलन देखने आने वाले श्रद्धालु केवल एक धार्मिक आयोजन के दर्शक नहीं होते, बल्कि उस भावभूमि का हिस्सा बनते हैं, जहां भाई के प्रति भाई का प्रेम सत्ता, वैभव और सांसारिक मोह से ऊपर दिखाई देता है। भरत का त्याग और राम का स्नेह भारतीय संस्कृति के उन आदर्शों को जीवंत कर देता है, जिनकी प्रासंगिकता सदियों बाद भी कम नहीं हुई है।
हाथी पर सवार होकर पहुंचे कुंवर अनंत नारायण
नाटी इमली के भरत मिलाप की लीला में काशीराज परिवार के कुंवर अनंत नारायण हाथी पर सवार होकर पहुंचे। उन्हें देखकर लोगों में उत्साह और बढ़ गया। काशीवासियों ने हर-हर महादेव के उद्घोष के साथ कुंवर का अभिवादन किया।
कनाडा से आई सौम्या लीला देखकर हुईं अभिभूत
इस बार नाटी इमली के भरत मिलाप की साक्षी बनीं कनाडा से आईं सौम्या अग्रवाल के लिए यह अनुभव बेहद खास रहा। उन्होंने बताया कि अब तक नाना के मुंह से इस ऐतिहासिक आयोजन के बारे में सुना था और इसके बारे में पढ़ा भी था, लेकिन पहली बार इसे अपनी आंखों से देखने का अवसर मिला।
सौम्या के मुताबिक, राम-भरत के मिलन के उन चंद पलों को देखना अद्भुत और बेहद सुकून देने वाला अनुभव था। उन्हें लगा मानो साक्षात प्रभु श्रीराम उनके सामने प्रकट हो गए हों। उन्होंने भावुक होकर कहा, “अपना भारत और अपने बनारस का कोई सानी नहीं है। विदेश में ऐसा सुख नहीं है।”
सौम्या ने कहा कि बनारस अब बहुत बदल गया है। यू-ट्यूब और फेसबुक जैसे माध्यमों से यहां की परंपराओं की जानकारी दूर-दूर तक पहुंच रही है। वह भी अपने दोस्तों को भरत मिलाप के बारे में बताएंगी और उन्हें इस आयोजन को देखने के लिए काशी लेकर आएंगी। उन्होंने प्रशासन के प्रयासों की सराहना करते हुए आयोजन को और बेहतर ढंग से कराने की अपील भी की।
पांच दशक से देख रहीं ममता, हर बार वही दिव्यता
भरत मिलाप की परंपरा से लोगों का जुड़ाव कितना गहरा है, इसका एहसास ममता वर्मा की बातों से होता है। वह पिछले 50 वर्षों से इस लीला को देख रही हैं। उनके लिए हर साल राम-भरत का मिलन एक नया आध्यात्मिक अनुभव लेकर आता है। ममता कहती हैं कि दोनों भाइयों को गले मिलते देखकर ऐसा लगता है, मानो स्वर्ग उतर आया हो।
हालांकि, समय के साथ आयोजन का स्वरूप देखने वालों की संख्या के लिहाज से बदल गया है। ममता के मुताबिक, पहले इतनी भीड़ नहीं होती थी, लेकिन अब श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ गई है। मोबाइल और इंटरनेट के दौर में इस ऐतिहासिक परंपरा के बारे में अधिक लोगों को जानकारी मिल रही है, जिसका असर नाटी इमली में उमड़ने वाली भीड़ में भी दिखाई देता है।
राम-भरत का मिलन, रिश्तों की मर्यादा का संदेश
काशी का भरत मिलाप केवल एक लीला नहीं, बल्कि रिश्तों की उस गरिमा का उत्सव है, जिसमें प्रेम के आगे दूरी हार जाती है और त्याग के आगे सत्ता छोटी पड़ जाती है। राम और भरत का आलिंगन याद दिलाता है कि परिवार की असली ताकत अधिकार में नहीं, बल्कि सम्मान, विश्वास और समर्पण में होती है।
यही वजह है कि सदियों पुरानी इस परंपरा का आकर्षण आज भी बरकरार है। समय बदलता रहा, पीढ़ियां बदलती रहीं, देखने के तरीके बदल गए, लेकिन नाटी इमली में राम-भरत के मिलन की प्रतीक्षा आज भी वैसी ही है। तीन मिनट 36 सेकंड में संपन्न होने वाली यह लीला समाप्त जरूर हो जाती है, मगर अपने पीछे आस्था, भावुकता और भाईचारे का ऐसा अहसास छोड़ जाती है, जो श्रद्धालुओं के मन में लंबे समय तक जीवित रहता है।