संतान की दीर्घायु के लिए माताओं ने रखा निर्जला जितिया व्रत, जीमूतवाहन की पूजा कर सुनी कथा
कुंडों, तालाबों और सरोवरों के किनारे जुटीं महिलाएं, फल-फूल से सजी डलियों के साथ विधि-विधान से किया पूजन
वाराणसी। संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना को लेकर शनिवार को माताओं ने कठिन निर्जला जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत रखा। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक व्रत को लेकर आस्था और श्रद्धा का माहौल रहा। विभिन्न कुंडों, तालाबों और सरोवरों के किनारे महिलाएं समूह में एकत्र हुईं। फल-फूल और पूजन सामग्री से सजी डलियों के साथ भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना की और व्रत की कथा सुनी।
सुबह से ही पूजा स्थलों पर महिलाओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। महिलाओं ने पारंपरिक विधि से पूजन कर अपनी संतानों की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की। कई स्थानों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से बैठकर कथा श्रवण किया। ग्रामीण इलाकों में भी जगह-जगह महिलाएं एकत्र होकर पूजा और धार्मिक अनुष्ठान में शामिल हुईं।
जीमूतवाहन के त्याग की कथा से जुड़ी है परंपरा
जितिया व्रत की परंपरा भगवान जीमूतवाहन से जुड़ी पौराणिक कथा पर आधारित मानी जाती है। मान्यता के अनुसार जीमूतवाहन दयालु और परोपकारी थे। उन्होंने दूसरों के प्राणों की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। इसी त्याग और करुणा की स्मृति में संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से माताएं यह व्रत करती हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार गंधर्वराज के पुत्र जीमूतवाहन ने राजपाट का मोह त्यागकर अपने पिता की सेवा का मार्ग चुना था। एक दिन भ्रमण के दौरान उन्हें एक नाग माता के विलाप की आवाज सुनाई दी। जानकारी करने पर पता चला कि नागवंश और गरुड़ के बीच हुए समझौते के तहत प्रतिदिन एक नाग को गरुड़ के आहार के लिए जाना पड़ता था। उस दिन शंखचूड़ नामक नाग की बारी थी।
नाग माता की पीड़ा देखकर जीमूतवाहन ने शंखचूड़ के स्थान पर स्वयं को प्रस्तुत करने का निर्णय लिया। वे लाल वस्त्र पहनकर गरुड़ के सामने पहुंच गए। गरुड़ उन्हें नाग समझकर अपने साथ ले गए। बाद में जब उन्हें जीमूतवाहन के त्याग का पता चला तो वे प्रभावित हुए। मान्यता है कि गरुड़ ने नागों को अभयदान दिया और जीमूतवाहन को पुनर्जीवन प्रदान किया।
फल-फूल और पूजन सामग्री से सजीं डलियां
जितिया व्रत में फल-फूल और अन्य पूजन सामग्री का विशेष महत्व माना जाता है। महिलाएं डलियों में विभिन्न प्रकार के फल, फूल और पूजा की सामग्री सजाकर पूजा स्थलों पर पहुंचीं। सामूहिक रूप से भगवान जीमूतवाहन का पूजन करने के बाद व्रत कथा का श्रवण किया गया। महिलाओं ने भगवान से संतान के जीवन में आने वाले संकटों को दूर करने और उन्हें दीर्घायु प्रदान करने की प्रार्थना की। पूजा स्थलों पर महिलाओं की मौजूदगी से धार्मिक वातावरण बना रहा। शहरी क्षेत्रों के साथ ही गांवों में भी महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार व्रत का पालन किया।
नहाय-खाय से शुरू होती है परंपरा
जितिया व्रत की परंपरा नहाय-खाय से शुरू होती है। पहले दिन व्रती महिलाएं स्नान आदि के बाद शुद्धता के साथ सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इसके बाद अगले दिन निर्जला उपवास का संकल्प लिया जाता है। व्रत के दौरान धार्मिक नियमों और परंपराओं का पालन किया जाता है। दूसरे दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं। इस दौरान अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता। भगवान जीमूतवाहन की पूजा के साथ चील और सियारिन से जुड़ी व्रत कथा सुनने की भी परंपरा है। कई स्थानों पर महिलाओं ने समूह में बैठकर कथा सुनी और पूजा-अर्चना पूरी की।
पारण के साथ पूरा होगा व्रत
जितिया व्रत का समापन तीसरे दिन सूर्योदय के बाद पारण के साथ होता है। इसके बाद व्रती महिलाएं अन्न-जल ग्रहण कर व्रत खोलती हैं। पारण के अवसर पर कई घरों में पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। नोनी का साग, मड़ुआ की रोटी समेत अन्य पारंपरिक पकवान तैयार करने की परंपरा भी कई परिवारों में देखने को मिलती है।
जितिया व्रत धार्मिक आस्था के साथ माताओं के अपनी संतान के प्रति ममता, समर्पण और मंगलकामना का प्रतीक भी माना जाता है। कठिन निर्जला उपवास के बावजूद महिलाओं ने श्रद्धा के साथ व्रत रखा और भगवान जीमूतवाहन से अपनी संतानों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखमय जीवन की कामना की।