मसाने की होली: आस्था, साधना और सांस्कृतिक एकता का अद्वितीय उत्सव - कपाली बाबा
वाराणसी। काशी की प्राचीन धार्मिक परम्पराओं में “मसाने की होली” का विशिष्ट और गहन आध्यात्मिक महत्व है। यह आयोजन केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि शिवत्व की अनुभूति और जीवन-मरण के दार्शनिक सत्य का अद्भुत संगम है। बम-बम के जयघोष से गुंजायमान महादेव की नगरी में नागा साधु, किन्नर समुदाय, अघोर साधक तथा सामान्य श्रद्धालु एक साथ सम्मिलित होकर इस अलौकिक परम्परा को साकार करते हैं। गृहस्थ और विरक्तों का ऐसा दिव्य समागम केवल काशी में ही संभव है।
मोक्ष और महाकाल का संदेश
अघोरपीठ हरिश्चंद्र घाट के पीठाधीश्वर कपाली बाबा ने बताया कि काशी भगवान शिव द्वारा स्थापित ‘अविमुक्त क्षेत्र’ है। यह नगरी सामान्य नियमों और वर्जनाओं से परे है। यहां मृत्यु अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार मानी जाती है। उन्होंने कहा कि मसाने की होली हमें सिखाती है कि मृत्यु से भय कैसा? जब स्वयं महादेव महाकाल हैं, तो उनके सानिध्य में मृत्यु भी परम आनंद है। काशी में मृत्यु का भी उत्सव मनाया जाता है-यह अध्यात्म की चरम पराकाष्ठा है।”
परम्परा की गरिमा और सुधार
कपाली बाबा के अनुसार, मसाने की होली एक पवित्र धार्मिक आयोजन है। विगत वर्षों में इसमें कुछ अवांछित प्रवृत्तियों के प्रवेश की शिकायतें सामने आई थीं, किन्तु संत समाज और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से आवश्यक सुधार किए गए हैं। इससे आयोजन की गरिमा और पवित्रता पुनः स्थापित हुई है। पारम्परिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि, शिवभक्ति के गीत और चिताभस्म की प्रतीकात्मक उपस्थिति में सहभागी स्वयं को शिवमय अनुभव करते हैं।
350 वर्ष पुरानी संगठित परम्परा
पारम्परिक साक्ष्यों के अनुसार, इस उत्सव को संगठित स्वरूप लगभग 350 वर्ष पूर्व बाबा काल भैरव के तत्कालीन पीठाधिपति अघोरी उमानाथ, बाबा कीनाराम के प्रधान शिष्य बाबा बीजाराम तथा नाथ परम्परा के संत योगी दीनानाथ के संयोजन में प्रारम्भ किया गया। स्थानीय इतिहासकारों और परम्परागत अभिलेखों में इसका उल्लेख मिलता है।
लोकपरम्पराओं का अद्भुत वैभव
भारत के विभिन्न हिस्सों में होली की विविध परम्पराएं प्रचलित हैं-जैसे बरसाने की लठमार होली, लड्डुओं की होली, फूलों की होली—उसी प्रकार काशी की चिताभस्म होली अपनी आध्यात्मिक विशिष्टता के कारण अद्वितीय है। इन परम्पराओं को केवल शास्त्रों में नहीं, बल्कि लोकमान्यताओं और आस्था में समझना चाहिए।
जोगीरा और कबीरा की जीवित परम्परा
काशी के घाटों पर होली के अवसर पर संत समाज की सहभागिता प्राचीन काल से रही है। शैव समाज ‘जोगीरा’ के माध्यम से आध्यात्मिक और सामाजिक प्रश्नों को स्वर देता था, वहीं निराकार ब्रह्म के उपासक ‘कबीरा’ परम्परा जनचेतना जगाती रही। आज भी उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में जोगीरा और कबीरा की परम्परा जीवंत है।
श्रद्धालुओं से अपील
वर्तमान समय में मणिकर्णिका घाट एवं हरिश्चंद्र घाट पर विभिन्न निर्माण एवं विकास कार्य संचालित हैं। अतः श्रद्धालुओं से आग्रह है कि वे धार्मिक मर्यादाओं का पालन करते हुए दर्शन-पूजन कर महातीर्थ को प्रणाम करें और अनुशासन बनाए रखें। काशी में तर्क और शास्त्रार्थ की प्राचीन परम्परा रही है। मतभेदों को उसी परम्परा के अनुरूप स्वीकार करते हुए इस नगरी की धार्मिक और आध्यात्मिक गरिमा को बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। काशी की “मसाने की होली” सनातन परम्परा, समरसता और शिवत्व की अनुभूति का प्रतीक है। आइए, इस अद्भुत उत्सव की पवित्रता और आध्यात्मिकता को श्रद्धा व अनुशासन के साथ बनाए रखें।