जीते-जी अपनों ने नहीं पूछा हाल, मौत के बाद संपत्ति और बीमा के लिए पहुंचे

पितृपक्ष में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का तर्पण और श्राद्ध कर उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहे हैं। काशी के सामने घाट स्थित अपना घर आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की कहानियां इसी बीच परिवार और रिश्तों की बदलती तस्वीर सामने रख रही हैं। आश्रम के अनुसार, पिछले एक वर्ष में यहां रहने वाले 55 बुजुर्गों की मौत हुई। इनमें कई ऐसे थे, जिनके जीते-जी परिजन उनका हाल जानने तक नहीं पहुंचे। बीमारी के दौरान सूचना देने के बावजूद मुलाकात नहीं की, लेकिन मौत की खबर मिलते ही कुछ परिजन अचानक आश्रम पहुंच गए।
 

सामने घाट के अपना घर आश्रम में रिश्तों के बदलते मायने की तस्वीर, एक साल में 55 बुजुर्गों की मौत, कई की अंतिम यात्रा में भी नहीं पहुंचे परिजन

पितृपक्ष में पूर्वजों के तर्पण के बीच आश्रम की कहानियां खड़े कर रहीं सवाल, बीमारी में दूरी बनाने वाले कुछ परिजन मौत के बाद शव, दस्तावेज और सामान लेने पहुंचे

आश्रम में रह रहीं 275 महिलाएं, कई बुजुर्गों की बीमारी के दौरान परिजनों ने नहीं ली सुध

मौत के बाद कुछ परिजन शव और सामान लेने पहुंचे, कुछ मामलों में संपत्ति, जमीन और बीमा से जुड़े दस्तावेज बने प्राथमिकता


रिपोर्ट- ओमकारनाथ 


वाराणसी। पितृपक्ष में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का तर्पण और श्राद्ध कर उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहे हैं। काशी के सामने घाट स्थित अपना घर आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की कहानियां इसी बीच परिवार और रिश्तों की बदलती तस्वीर सामने रख रही हैं। आश्रम के अनुसार, पिछले एक वर्ष में यहां रहने वाले 55 बुजुर्गों की मौत हुई। इनमें कई ऐसे थे, जिनके जीते-जी परिजन उनका हाल जानने तक नहीं पहुंचे। बीमारी के दौरान सूचना देने के बावजूद मुलाकात नहीं की, लेकिन मौत की खबर मिलते ही कुछ परिजन अचानक आश्रम पहुंच गए।


आश्रम संचालक डॉ. के. निरंजन के अनुसार, कुछ मामलों में शव लेने पहुंचे परिजनों की दिलचस्पी भावनात्मक जुड़ाव से अधिक मृतक की संपत्ति, जमीन, बीमा और दस्तावेजों को लेकर दिखाई दी। कुछ बुजुर्गों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी आश्रम को ही उठानी पड़ी। बाद में परिजन मृत्यु प्रमाणपत्र या दूसरे दस्तावेज लेने पहुंचे। ऐसे मामले पितृपक्ष की उस परंपरा के बीच गंभीर सामाजिक सवाल खड़े करते हैं, जिसमें जीवित रहते माता-पिता की सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म माना गया है।

सामान भी सुरक्षित रखता है आश्रम
अपना घर आश्रम में आने वाले बुजुर्गों के सामान को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जाती है। डॉ. निरंजन के मुताबिक, बुजुर्ग के कपड़े, नकदी, गहने और अन्य सामान को टैग कर उसकी तस्वीर भी सुरक्षित रखी जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बुजुर्ग के पास मौजूद सामान का रिकॉर्ड बना रहे।


उनके अनुसार, बुजुर्ग की मौत के बाद जब कोई परिजन शव लेने पहुंचता है तो कई बार वह मृतक का सामान भी साथ ले जाता है। आश्रम के सामने ऐसी परिस्थितियां भी आती हैं, जब परिजन पहले लंबे समय तक बुजुर्ग से मिलने नहीं आते, लेकिन मृत्यु के बाद दस्तावेज और सामान को लेकर सक्रिय हो जाते हैं।


महिला बुजुर्गों के मामलों में और कठिन स्थिति
डॉ. निरंजन के मुताबिक, महिला बुजुर्गों की मौत के बाद कई बार यह तय करना भी मुश्किल हो जाता है कि शव की जिम्मेदारी कौन लेगा। पति, मायका और ससुराल पक्ष एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं। आश्रम की ओर से फोन किए जाने के बावजूद कई बार लोग आने से बचते हैं या अलग-अलग कारण बताते हैं।


आश्रम में करीब 275 महिलाएं रह रही हैं। इनमें कई ऐसी हैं, जिन्हें परिवार के लोग जीवन के अंतिम पड़ाव में यहां छोड़ गए और उसके बाद दोबारा संपर्क नहीं किया। कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं, जो परिवार से अलग परिस्थितियों में यहां पहुंचीं और अब आश्रम को ही अपना सहारा मानकर रह रही हैं।


105 वर्षीय महिला को बेटे ने पहचानने से किया इनकार
आश्रम में रह रहीं 105 वर्षीय एक महिला की कहानी भी रिश्तों के बदलते स्वरूप को सामने रखती है। डॉ. निरंजन के अनुसार, महिला ने अपने सौतेले बेटे को गोद लेकर उसका पालन-पोषण किया था। आश्रम की ओर से जब बेटे को मां से मिलने के लिए बुलाया गया तो उसने आने से इनकार कर दिया।


डॉ. निरंजन के मुताबिक, बेटे ने अपनी और महिला की अलग जातिगत पहचान का हवाला देते हुए उन्हें मां मानने से इनकार किया। उम्र के इस पड़ाव पर मां-बेटे के रिश्ते से जुड़ा यह मामला आश्रम में मौजूद लोगों के लिए भी पीड़ादायक रहा।


बीमारी में नहीं पहुंचे, मौत के बाद दुबई से आया बेटा
बेनियाबाग क्षेत्र के करीब 65 वर्षीय एक बुजुर्ग को लावारिस हालत में सड़क से उठाकर अपना घर आश्रम लाया गया था। वह लगभग एक वर्ष तक आश्रम में रहे। उनका बेटा दुबई में नौकरी करता था। बीमारी के दौरान आश्रम की ओर से पड़ोस में रहने वाले रिश्तेदार को कई बार सूचना दी गई, लेकिन बुजुर्ग को देखने के लिए कोई नहीं पहुंचा।


बुजुर्ग की मौत के बाद जब बेटे को सूचना दी गई तो वह दो दिन बाद दुबई से वाराणसी आया और शव अपने साथ ले गया। बीमारी के दौरान पिता की सुध न लेने और मौत के बाद शव लेने पहुंचने का यह घटनाक्रम आश्रम में मौजूद लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहा।


तीन सराफा दुकान और पांच बीघा जमीन की जानकारी के बाद पहुंचे परिजन
दरभंगा के करीब 70 वर्षीय एक बुजुर्ग सराफा कारोबार से जुड़े परिवार से थे। पारिवारिक परिस्थितियों से परेशान होकर वह जीवन के अंतिम दिनों में काशी चले आए। कुछ समय बाद उन्हें गंगा किनारे घाट पर बेहोशी की हालत में पाया गया। इसके बाद उन्हें अपना घर आश्रम लाया गया।

करीब छह महीने रहने के दौरान उन्होंने बताया कि उनकी तीन सराफा दुकानें और गांव में पांच बीघा जमीन है। बीमारी के दौरान आश्रम की ओर से परिवार को सूचना देने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई उन्हें देखने नहीं आया। बुजुर्ग की मौत के बाद परिजन आश्रम पहुंचे और शव अपने साथ ले गए।


आश्रम संचालक के मुताबिक, इस तरह के मामलों में सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि जब बुजुर्ग जीवित थे और उन्हें देखभाल की जरूरत थी, तब परिवार से दूरी क्यों बनी रही और मौत के बाद अचानक संपर्क क्यों बढ़ गया।


50 लाख के बीमा वाले बुजुर्ग की मौत के अगले दिन पहुंचा बेटा
देवरिया के करीब 60 वर्षीय बुजुर्ग जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने अपने नाम से करीब 50 लाख रुपये का बीमा करा रखा था। वह पिछले तीन वर्षों से अपना घर आश्रम में रह रहे थे। तबीयत खराब होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। आश्रम की ओर से बेटे को बीमारी की जानकारी दी गई, लेकिन वह उन्हें देखने नहीं आया।


बुजुर्ग की मौत के बाद अगले ही दिन बेटा आश्रम पहुंचा और शव अपने साथ ले गया। आश्रम संचालक के अनुसार, ऐसे मामलों में मृत्यु के बाद परिजनों की अचानक सक्रियता कई सवाल छोड़ जाती है। हालांकि किसी परिजन की मंशा के संबंध में अंतिम निष्कर्ष संबंधित तथ्यों की पुष्टि के बाद ही निकाला जा सकता है।


अंतिम संस्कार तक में नहीं पहुंच पाए परिजन
आश्रम में ऐसे मामले भी सामने आते हैं, जब बुजुर्ग की मौत के बाद परिजन शव लेने तक नहीं पहुंचते। ऐसी स्थिति में आश्रम की ओर से अंतिम संस्कार कराया जाता है। बाद में कुछ लोग मृत्यु प्रमाणपत्र या अन्य दस्तावेज लेने के लिए संपर्क करते हैं।


आश्रम प्रबंधन का कहना है कि बुजुर्गों के जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हें सम्मान, देखभाल और अपनापन देने का प्रयास किया जाता है। परिवार से दूर रहने वाले इन बुजुर्गों के लिए आश्रम केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि उनका सहारा बन जाता है।


पितृपक्ष में तर्पण के बीच बड़ा सामाजिक सवाल
काशी में पितृपक्ष के दौरान गंगा घाटों पर बड़ी संख्या में लोग अपने पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करते हैं। परंपरा में पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का विशेष महत्व है। ऐसे समय में अपना घर आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की कहानियां समाज के सामने एक अलग सवाल रखती हैं-क्या माता-पिता और बुजुर्गों को सम्मान और अपनापन केवल उनके निधन के बाद ही याद किया जाना चाहिए?

आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। कुछ को परिवार ने यहां छोड़ा, कुछ लावारिस अवस्था में मिले और कुछ परिस्थितियों से परेशान होकर स्वयं काशी पहुंचे। लेकिन उनकी कहानियों में एक बात समान दिखाई देती है-बुढ़ापे में उन्हें परिवार के साथ और भावनात्मक सहारे की जरूरत थी।

पितृपक्ष हमें दिवंगत पूर्वजों को याद करने की परंपरा से जोड़ता है, लेकिन इन बुजुर्गों की जिंदगी यह भी याद दिलाती है कि रिश्तों की असली परीक्षा व्यक्ति के जीवित रहते होती है। उनके प्रति सम्मान, समय, देखभाल और अपनापन ही वह जिम्मेदारी है, जिसकी जरूरत जीवन के अंतिम पड़ाव में सबसे अधिक होती है।