काशी की रथयात्रा : पुरी से आएंगी 500 विशेष पताकाएं, 108 डमरू दल और इस्कॉन के संकीर्तन से और भव्य होगी 236 वर्ष पुरानी परंपरा

वाराणसी। धर्मनगरी काशी में भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक रथयात्रा को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। इस वर्ष रथयात्रा और डोलीयात्रा को और अधिक भव्य एवं दिव्य स्वरूप देने के लिए ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर से 500 विशेष पताकाएं (ध्वज) मंगाई जा रही हैं। पुरी मंदिर के पुजारियों द्वारा विशेष रूप से तैयार कराई गई इन पताकाओं को डोलीयात्रा और रथयात्रा के दौरान श्रद्धालु हाथों में लेकर भगवान जगन्नाथ के जयघोष के साथ यात्रा में शामिल होंगे।
 

रिपोर्ट / ओमकार नाथ

वाराणसी। धर्मनगरी काशी में भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक रथयात्रा को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। इस वर्ष रथयात्रा और डोलीयात्रा को और अधिक भव्य एवं दिव्य स्वरूप देने के लिए ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर से 500 विशेष पताकाएं (ध्वज) मंगाई जा रही हैं। पुरी मंदिर के पुजारियों द्वारा विशेष रूप से तैयार कराई गई इन पताकाओं को डोलीयात्रा और रथयात्रा के दौरान श्रद्धालु हाथों में लेकर भगवान जगन्नाथ के जयघोष के साथ यात्रा में शामिल होंगे।

15 जुलाई को निकलेगी भव्य डोलीयात्रा
ट्रस्ट श्री जगन्नाथ मंदिर के सचिव शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि 15 जुलाई की शाम अस्सी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य डोलीयात्रा निकाली जाएगी। यात्रा मार्ग को आकर्षक ढंग से सजाया जाएगा और विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालु पुष्पवर्षा कर भगवान का स्वागत करेंगे। पूरे मार्ग पर भक्तिमय वातावरण के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की सहभागिता रहेगी।

108 डमरू दल और इस्कॉन का संकीर्तन होंगे प्रमुख आकर्षण
इस वर्ष डोलीयात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण 108 डमरू दलों की सामूहिक प्रस्तुति होगी। भगवान की डोली के आगे-आगे डमरुओं की गूंज से पूरा वातावरण शिवमय और भक्तिमय हो उठेगा। इसके साथ ही दुर्गाकुंड स्थित इस्कॉन मंदिर की 40 सदस्यीय संकीर्तन मंडली हरिनाम संकीर्तन करते हुए पूरी यात्रा में शामिल रहेगी, जिससे श्रद्धा और भक्ति का वातावरण और अधिक सजीव होगा।

भगवान को चढ़ रहा औषधीय काढ़ा, श्रद्धालुओं में प्रसाद का वितरण
रथयात्रा से पहले अस्सी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान के स्वास्थ्य लाभ की परंपरा के तहत विशेष औषधीय काढ़े का भोग लगाया जा रहा है। मंदिर के पुजारी राधेश्याम पांडेय ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा स्नान पूर्णिमा के बाद अस्वस्थ हो जाते हैं। इस दौरान लौंग, इलायची, दालचीनी, तेजपत्ता, काली मिर्च सहित कई औषधीय जड़ी-बूटियों और मसालों से तैयार विशेष काढ़ा भगवान को अर्पित किया जाता है।

भगवान को भोग लगाने के बाद प्रतिदिन शाम 4:30 बजे से यह काढ़ा श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित किया जा रहा है। प्रतिदिन लगभग 500 से अधिक श्रद्धालु इस प्रसाद को ग्रहण कर रहे हैं। मान्यता है कि यह औषधीय प्रसाद भगवान के स्वास्थ्य लाभ का प्रतीक होने के साथ श्रद्धालुओं के लिए भी स्वास्थ्यवर्धक और मंगलकारी माना जाता है।

236 वर्ष पुरानी परंपरा का गौरव
शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि काशी की जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास लगभग 236 वर्ष पुराना है। वर्ष 1790 में पुरी के मुख्य पुजारी पंडित स्वामी तेजोनिधि ब्रह्मचारी ने अस्सी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान के दिव्य विग्रह की प्रतिष्ठा कराई थी और मंदिर का निर्माण भी उसी समय पूर्ण हुआ था।

इसके बाद शापुरी राजवंश के संरक्षण में वर्ष 1802 से भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का नियमित आयोजन शुरू हुआ, जो पिछले 224 वर्षों से लगातार जारी है। यह यात्रा आज भी काशी की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।

देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु
हर वर्ष देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु काशी की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा में शामिल होने के लिए वाराणसी पहुंचते हैं। इस बार पुरी से आने वाली विशेष पताकाएं, 108 डमरू दलों की प्रस्तुति, इस्कॉन का हरिनाम संकीर्तन और श्रद्धालुओं द्वारा की जाने वाली पुष्पवर्षा इस आयोजन को पहले से अधिक भव्य, आकर्षक और यादगार बनाने जा रही है।