तारक मंत्र और मोक्ष की नगरी काशी : क्यों नहीं ले जानी चाहिए यहां की मिट्टी और गंगाजल, जानिए धार्मिक मान्यता
वाराणसी। सनातन परंपरा में काशी को केवल एक प्राचीन नगर नहीं, बल्कि भगवान शिव की अविमुक्त नगरी और मोक्ष की भूमि माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि काशी में प्राण त्यागने वाले जीव को स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र का उपदेश देते हैं, जिससे उसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है। इसी विश्वास के कारण देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन, गंगा स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए काशी पहुंचते हैं, जबकि अनेक लोग जीवन के अंतिम समय में यहां निवास करने की भी कामना रखते हैं।
धार्मिक ग्रंथों और काशी की प्राचीन परंपराओं में इस नगरी को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्रदान किया गया है। मान्यता है कि मृत्यु के समय भगवान शिव जीव के कान में राम नाम का तारक मंत्र सुनाते हैं। इसी कारण काशी को "मोक्षदायिनी नगरी" और "अविमुक्त क्षेत्र" कहा जाता है। विश्वास है कि भगवान शिव कभी काशी का परित्याग नहीं करते और उनकी निरंतर उपस्थिति इस नगर को अन्य तीर्थों से अलग पहचान देती है।
काशी खंड सहित अनेक धार्मिक ग्रंथों में बाबा विश्वनाथ के दर्शन, गंगा स्नान, जप, तप और दान-पुण्य को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट जैसे स्थानों का महत्व भी इसी आध्यात्मिक मान्यता से जुड़ा है, जहां अंतिम संस्कार को मोक्ष प्राप्ति का माध्यम माना जाता है।
काशी से गंगाजल और मिट्टी बाहर ले जाने को लेकर भी एक प्राचीन धार्मिक मान्यता प्रचलित है। मान्यता के अनुसार काशी की मिट्टी और गंगा के जल में असंख्य सूक्ष्म जीवों का निवास होता है। सनातन दर्शन प्रत्येक जीव को मोक्ष का अधिकारी मानता है। धार्मिक विश्वास है कि काशी में रहने वाले इन जीवों पर भी भगवान शिव की विशेष कृपा रहती है और उन्हें भी तारक मंत्र के माध्यम से मुक्ति का अवसर प्राप्त होता है।
इसी आधार पर कहा जाता है कि काशी की मिट्टी या गंगाजल को बिना विशेष आवश्यकता बाहर नहीं ले जाना चाहिए। मान्यता है कि यदि इन माध्यमों से यहां के सूक्ष्म जीव अन्य स्थानों पर पहुंच जाते हैं तो वे उस पवित्र क्षेत्र से दूर हो सकते हैं, जहां उनकी मोक्ष यात्रा से जुड़ी धार्मिक अवधारणा मानी जाती है। इसलिए इस परंपरा के पीछे केवल आस्था ही नहीं, बल्कि जीव मात्र के कल्याण और करुणा का भाव भी निहित माना जाता है।
धार्मिक विद्वानों के अनुसार यह मान्यता लोगों को प्रकृति और प्रत्येक जीव के प्रति संवेदनशील रहने का संदेश देती है। काशी की पवित्रता को केवल व्यक्तिगत धार्मिक लाभ तक सीमित न रखकर यहां के समस्त जीव-जंतुओं के सम्मान और संरक्षण का भी भाव इसमें समाहित है।
इसी आध्यात्मिक परंपरा के कारण काशी आज भी विश्वभर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बनी हुई है। यहां हर-हर महादेव के उद्घोष, गंगा आरती, मंदिरों में होने वाले मंत्रोच्चार और बाबा विश्वनाथ की आराधना के बीच जीवन और मृत्यु दोनों को आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाता है। यही विश्वास सदियों से काशी को सनातन संस्कृति में मोक्ष की नगरी के रूप में विशिष्ट स्थान प्रदान करता आ रहा है।