काशी ने दिया ‘आजाद’ नाम : चंद्रशेखर आजाद की जयंती 23 जुलाई पर बनारस से उनके गहरे जुड़ाव की कहानी

वाराणसी। 23 जुलाई को पूरा देश महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जयंती मनाता है। वर्ष 1906 में मध्य प्रदेश के भावरा गांव में जन्मे इस स्वाभिमान के प्रतीक को इतिहास में आमतौर पर काकोरी कांड, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन और प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क की अंतिम मुठभेड़ के लिए याद किया जाता है। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके जीवन का सबसे निर्णायक और क्रांतिकारी अध्याय वाराणसी में लिखा गया था। बनारस की पावन माटी में ही संस्कृत पढ़ने आए एक साधारण बालक चंद्रशेखर तिवारी के 'आजाद' बनने की पूरी पटकथा तैयार हुई थी।
 

वाराणसी। 23 जुलाई को पूरा देश महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जयंती मनाता है। वर्ष 1906 में मध्य प्रदेश के भावरा गांव में जन्मे इस स्वाभिमान के प्रतीक को इतिहास में आमतौर पर काकोरी कांड, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन और प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क की अंतिम मुठभेड़ के लिए याद किया जाता है। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके जीवन का सबसे निर्णायक और क्रांतिकारी अध्याय वाराणसी में लिखा गया था। बनारस की पावन माटी में ही संस्कृत पढ़ने आए एक साधारण बालक चंद्रशेखर तिवारी के 'आजाद' बनने की पूरी पटकथा तैयार हुई थी।

महान विद्वान बनने का सपना और शिक्षा के लिए काशी आगमन
चंद्रशेखर आजाद की माता जगरानी देवी चाहती थीं कि उनका बेटा संस्कृत का प्रकांड पंडित और महान विद्वान बने। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी, फिर भी मां के दृढ़ संकल्प और आग्रह के कारण उन्हें प्राच्य विद्या के सबसे बड़े केंद्र काशी भेजा गया। बनारस पहुंचकर उन्होंने शिवपुर स्थित संस्कृत पाठशाला और कामाच्छा के पास सेंट्रल हिंदू स्कूल के वातावरण में वेदों और शास्त्रों का अध्ययन शुरू किया। बाद में वे काशी विद्यापीठ के शैक्षणिक माहौल से भी जुड़े, जहां शिक्षा के साथ-साथ देश की तत्कालीन परिस्थितियों की गहरी समझ भी विकसित हो रही थी।

असहयोग आंदोलन की ज्वाला और ज्ञानवापी की ऐतिहासिक घटना
वर्ष 1920-21 के दौरान महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की लहर पूरे देश में फैल चुकी थी और काशी भी इससे अछूती नहीं रही। मात्र 15 वर्ष के किशोर चंद्रशेखर अपनी पढ़ाई छोड़कर विदेशी कपड़ों की होली जलाने, शराब की दुकानों पर धरना देने और जुलूस निकालने में सक्रिय हो गए। 24 दिसंबर 1921 को एक प्रदर्शन के दौरान अंग्रेज पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जब उन्हें जिला मजिस्ट्रेट एम.पी. खरेघट के सामने पेश किया गया, तो बालक ने बेहद बेबाकी से अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और पता 'जेलखाना' बताया। इस उत्तर से तिलमिलाए मजिस्ट्रेट ने उन्हें 15 नंगे कोड़ों की क्रूर सजा सुनाई, जहां हर प्रहार पर उनके मुंह से सिर्फ 'भारत माता की जय' का उद्घोष निकला।

जन-अभिनंदन और 'आजाद' नाम का आधिकारिक जन्म
जेल से रिहा होने के बाद बनारस के प्रख्यात विद्वान पंडित गौरीशंकर शास्त्री ने उनके लहूलुहान शरीर पर दवा लगाई। इसके बाद ज्ञानवापी और दशाश्वमेध के आसपास काशी के नागरिकों ने उनका एक अभूतपूर्व नागरिक अभिनंदन आयोजित किया। जनसैलाब इतना विशाल था कि बालक चंद्रशेखर को एक ऊंचे तख्त पर खड़ा करना पड़ा ताकि लोग उनके दर्शन कर सकें। उसी ऐतिहासिक अवसर पर हाथ में चरखा लिए उनकी प्रसिद्ध तस्वीर ली गई और काशी की जनता ने उन्हें आधिकारिक रूप से 'आजाद' की उपाधि से नवाजा। इसी दिन उन्होंने संकल्प लिया था कि वे जीवन में कभी अंग्रेजों के हाथ जिंदा नहीं पकड़े जाएंगे।

लक्सा का रामकुंड अखाड़ा और रामापुरा के गुप्त ठिकाने
असहयोग आंदोलन स्थगित होने के बाद आजाद के लिए काशी सिर्फ पढ़ाई की जगह न रहकर क्रांति का मुख्य गंतव्य बन गई। वर्ष 1920 से 1925 तक का प्रवास उनके जीवन का सबसे लंबा ठहराव था। इस दौरान अंग्रेजी हुकूमत की सीआईडी से बचने के लिए वे लक्सा और रामापुरा की तंग गलियों में स्थित गुप्त ठिकानों में छिपे रहते थे। कुश्ती और कसरत के बेहद शौकीन आजाद लक्सा के रामकुंड अखाड़े में पहलवान के भेष में रहते थे। वे रोजाना दशाश्वमेध, अस्सी और केदार घाट पर घंटों गंगा में तैरते थे और शरीर पर अखाड़े की मिट्टी मलकर या साधु-पंडा का छद्म रूप धारण करके पुलिस की आंखों में धूल झोंककर निकल जाते थे।

मन्मथनाथ गुप्ता से मुलाकात और सशस्त्र क्रांति का संगठन
काशी की गलियों में रहते हुए ही चंद्रशेखर आजाद का संपर्क उस दौर के चर्चित क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्ता से हुआ। गुप्ता जी ने ही आजाद का परिचय पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, शचींद्रनाथ सान्याल और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के अन्य प्रमुख नेताओं से कराया। इसके बाद आजाद ने अखाड़ों और काशी विद्यापीठ के राष्ट्रभक्त युवाओं को जोड़कर एक मजबूत क्रांतिकारी दल का गठन करना शुरू किया। मदनपुरा और गोदौलिया के सेफ हाउस में गुप्त बैठकें करके वे बटुकेश्वर दत्त, राजगुरु और शिववर्मा जैसे भावी क्रांतिकारियों में रामायण व महाभारत की कथाओं के माध्यम से राष्ट्रप्रेम की अलख जगाते थे।

काशी के संस्कारों का अमिट प्रभाव और स्थायी विरासत
वाराणसी की मिट्टी और संस्कृति ने चंद्रशेखर आजाद के व्यक्तित्व को गढ़ने में आधारभूत भूमिका निभाई। काशी में अर्जित संस्कृत और धर्मग्रंथों के ज्ञान ने उन्हें अदम्य नैतिक बल दिया, वहीं अखाड़ों की जीवनशैली ने उन्हें शारीरिक रूप से वज्र के समान मजबूत और गुप्त संगठन चलाने में कुशल बनाया। काशी ने एक साधारण गरीब ब्राह्मण बालक को शरण देकर न केवल 'आजाद' नाम दिया, बल्कि उसके भीतर स्वाधीनता का ऐसा जुनून पैदा किया जिसने अंततः भारत मां को आजादी दिलाने में इतिहास रच दिया। आज भी बनारस की फिज़ाओं में उस 15 साल के बालक के शौर्य और हुंकार की गूंज साफ़ सुनाई देती है।