सुपरबग्स पर वार: भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा बैक्टीरिया खत्म करने वाला खास वायरस
वाराणसी। दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया यानी “सुपरबग्स” के खिलाफ लड़ाई में भारतीय वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे के मार्गदर्शन में दो युवा शोधकर्ताओं ने एक ऐसे विशेष वायरस की खोज की है, जो खतरनाक बैक्टीरिया को खत्म करने में सक्षम है। इस महत्वपूर्ण शोध को हाल ही में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘अप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी एंड बायोटेक्नोलॉजी’ में प्रकाशित किया गया है।
कोलकाता के सोवन आचार्य और उत्तर प्रदेश के कन्नौज के परमानंद कुशवाहा ने मिलकर “बैक्टीरियोफेज” नामक इस वायरस की पहचान की है। यह वायरस खासतौर पर प्रोटीयस मिराबिलिस बैक्टीरिया को निशाना बनाता है, जो गंभीर यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (यूटीआई) का कारण बनता है। यह बैक्टीरिया अपने चारों ओर “बायोफिल्म” नाम की एक सुरक्षात्मक परत बना लेता है, जिससे एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर हो जाती हैं। हालांकि प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया गया कि यह नया वायरस इस बायोफिल्म को करीब 55 प्रतिशत तक कम करने में सफल रहा।
इस खोज का नाम “प्रोटीयस फेज राम आरती 1324” रखा गया है, जिसे परमानंद कुशवाहा ने अपनी दिवंगत मां राम आरती को समर्पित किया है। वर्ष 2024 में उनकी मां गंभीर संक्रमण के चलते आईसीयू में भर्ती थीं, लेकिन किसी भी एंटीबायोटिक का असर नहीं हुआ और मल्टी-ऑर्गन फेलियर के कारण उनका निधन हो गया। इस व्यक्तिगत त्रासदी ने दोनों वैज्ञानिकों को सुपरबग्स के खिलाफ शोध के लिए और अधिक प्रेरित किया।
दोनों वैज्ञानिकों का सफर संघर्षों से भरा रहा है। सोवन आचार्य ने आर्थिक तंगी के बीच अपने करियर की शुरुआत महज 4500 रुपये मासिक वेतन पर एक निजी अस्पताल से की थी और बाद में टाटा मेडिकल सेंटर में टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में भी काम किया। कई असफलताओं के बावजूद उन्होंने 2013 में मेडिकल माइक्रोबायोलॉजी में स्नातक की पढ़ाई शुरू की, जहां उनकी मुलाकात परमानंद से हुई और दोनों ने साथ मिलकर शोध कार्य शुरू किया।
इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और मणिपाल यूनिवर्सिटी, जयपुर के प्रो. प्रशांत सुरवझला का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वर्तमान में सोवन आचार्य तिरुवनंतपुरम स्थित राजीव गांधी सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी में सीनियर रिसर्च फेलो हैं, जबकि परमानंद कुशवाहा करनाल स्थित राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में कार्यरत हैं। यह खोज विशेष रूप से कमजोर इम्यून सिस्टम वाले मरीजों जैसे कैंसर, बोन मैरो ट्रांसप्लांट या इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं लेने वाले लोगों के लिए भविष्य में जीवनरक्षक साबित हो सकती है।