IIT BHU का बड़ा नवाचार: मशरूम आधारित तकनीक से अपशिष्ट जल से हटेंगी खतरनाक धातुएं

आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने जल प्रदूषण से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के जैव रासायनिक अभियांत्रिकी विद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपशिष्ट जल से कैडमियम (Cd) और सीसा (Pb) जैसी विषैली भारी धातुओं को हटाने के लिए एक नई, कम लागत और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की है, जिसे हाल ही में पेटेंट भी प्राप्त हुआ है।
 

वाराणसी। आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने जल प्रदूषण से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के जैव रासायनिक अभियांत्रिकी विद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपशिष्ट जल से कैडमियम (Cd) और सीसा (Pb) जैसी विषैली भारी धातुओं को हटाने के लिए एक नई, कम लागत और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की है, जिसे हाल ही में पेटेंट भी प्राप्त हुआ है।

यह शोध कार्य एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विशाल मिश्रा के नेतृत्व में उनके पीएचडी शोधार्थी डॉ. वीर सिंह द्वारा किया गया। इस शोध में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मोहन पी. सिंह, डॉ. निधि सिंह तथा आईआईटी (बीएचयू) की प्रोफेसर आभा मिश्रा का भी सहयोग रहा।

शोधकर्ताओं द्वारा विकसित इस तकनीक का आधार मशरूम की एक प्रजाति Pleurotus citrinopileatus से प्राप्त फंगल बायोमास है। यह बायोमास जल में मौजूद भारी धातुओं को अवशोषित कर उन्हें प्रभावी ढंग से अलग कर देता है। खास बात यह है कि यह तकनीक एक साथ कई प्रकार की धातुओं को हटाने में सक्षम है, जिससे यह व्यावहारिक उपयोग के लिए अधिक उपयुक्त बनती है।

इस नवाचार को “A Composition for Removal of Heavy Metal Ions from Wastewater and a Method Thereof” शीर्षक के साथ पेटेंट (संख्या: 579217) प्रदान किया गया है। इसमें बायोपॉलिमर के उपयोग से अवशोषण क्षमता को और अधिक बढ़ाया गया है, जिससे इसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।

आज के समय में जल प्रदूषण एक गंभीर वैश्विक समस्या बन चुका है। World Health Organization के अनुसार जल जनित बीमारियों के कारण हर वर्ष लाखों लोगों की मौत होती है, जबकि UNICEF के आंकड़े बताते हैं कि दूषित पानी के कारण रोजाना हजारों बच्चों की जान चली जाती है। भारत में भी कई क्षेत्रों में लोग ऐसे पानी का उपयोग करने को मजबूर हैं, जिसमें खतरनाक धातुओं की मात्रा अधिक होती है।

इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कहा कि यह तकनीक संस्थान की वैज्ञानिक क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि यह नवाचार विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी साबित होगा, जहां संसाधनों की कमी है और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई तकनीक भविष्य में जल शोधन के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है और ग्रामीण व विकासशील क्षेत्रों में स्वच्छ जल उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।