मणिकर्णिका घाट पर खेली गई चिता भस्म की होली, उमड़े काशीवासी, विदेशी सैलानी भी बने अनूठे उत्सव के साक्षी
वाराणसी। आध्यात्मिक नगरी काशी एक बार फिर अनूठी परंपरा निभाई गई। महाश्मशान पर धधकती चिताओं के बीच चिता-भस्म की ‘मसाने की होली’ खेली गई। परंपरा और विवादों के बीच आयोजित इस अनोखे उत्सव में सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु, साधु-संत और देश-विदेश से आए पर्यटक शामिल हुए। इस बार घाट पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे, ताकि हुड़दंग करने वालों को रोका जा सके।
मान्यता है कि इस दिन महाश्मशान में स्वयं भगवान भोलेनाथ अपने गणों के साथ होली खेलते हैं। इसी आस्था के साथ भक्त ‘बाबा मसाननाथ’ के गण का स्वरूप धारण कर गले में नरमुंड की माला पहनकर और शरीर पर भस्म लगाकर घाट पर पहुंचे और चिता भस्म से होली खेली।
उत्साह, आस्था और अनोखी परंपरा
धधकती चिताओं के बीच डमरुओं के निनाद के बीच ‘होली खेले मसाने में’ जैसे पारंपरिक गीतों पर श्रद्धालु झूमते नजर आए। आयोजकों द्वारा चिता-भस्म की प्रतीकात्मक वर्षा की गई, जिसे भक्तों ने श्रद्धा भाव से स्वीकार किया।
काशी में यह परंपरा रंगभरी एकादशी के बाद शुरू होने वाले होली उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। रंगभरी एकादशी के अगले दिन आयोजित होने वाली यह चिता-भस्म होली पूरे वर्ष श्रद्धालुओं के इंतजार का केंद्र रहती है। मान्यता है कि ब्रज की होली के बाद काशी की होली का विशेष आध्यात्मिक महत्व है।
प्रशासन की सख्ती, बैरिकेडिंग के बीच आयोजन
भीड़ को नियंत्रित करने के लिए जिला प्रशासन ने इस बार विशेष इंतजाम किए थे। घाट की ओर जाने वाले मार्गों पर बैरिकेडिंग की गई थी। सतुआ बाबा आश्रम के पास भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही। प्रशासन ने इस बार घाट पर खुले आयोजन के बजाय बाबा मसाननाथ मंदिर परिसर में सीमित रूप से होली खेलने की अनुमति दी थी। पिछले वर्षों में जहां हजारों की भीड़ उमड़ती थी, वहीं इस बार प्रतिबंधों के चलते संख्या कुछ कम रही। इसके बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं दिखा।
विदेशी मेहमान भी बने साक्षी
चिता-भस्म की होली का आकर्षण केवल देश तक सीमित नहीं रहा। इस बार भी विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में इस अनूठी परंपरा को देखने पहुंचे। महाश्मशान में जीवन और मृत्यु के दार्शनिक भाव के बीच रंग और भस्म का यह संगम उन्हें विशेष रूप से आकर्षित करता है।
परंपरा पर उठे सवाल
इस आयोजन को लेकर विवाद भी सामने आया है। काशी विद्वत परिषद और केंद्रीय ब्राम्हण महासभा ने आयोजकों पर आरोप लगाया कि इस परंपरा को पौराणिक बताकर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। परिषद के सदस्य विनय पांडे का दावा है कि इस आयोजन की शुरुआत वर्ष 2014 के आसपास हुई और इसे प्राचीन परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना भ्रामक है। उन्होंने आरोप लगाया कि धार्मिक भावनाओं का सहारा लेकर इसे व्यावसायिक रूप दिया जा रहा है, जिससे सनातन परंपराओं को ठेस पहुंचती है।
आयोजक का पक्ष
आयोजक गुलशन कपूर ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि चिता-भस्म की होली सदियों पुरानी परंपरा है और इसका उल्लेख वेद-पुराणों में भी मिलता है। उनका कहना है कि विरोध करने वाले काशी की परंपराओं से अनभिज्ञ बाहरी लोग हैं। उन्होंने इसे काशी की जीवंत सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बताते हुए विवाद को अनावश्यक बताया।
आस्था, परंपरा और बहस के बीच काशी
मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली मसाने की होली आस्था, तांत्रिक परंपरा और काशी की विशिष्ट संस्कृति का अनूठा संगम मानी जाती है। जहां एक ओर भक्त इसे भगवान शंकर के साथ आध्यात्मिक मिलन का अवसर मानते हैं, वहीं दूसरी ओर इसके ऐतिहासिक आधार और स्वरूप को लेकर बहस जारी है। परंपरा और विवाद के इस द्वंद्व के बीच एक बात स्पष्ट है—काशी की सांस्कृतिक धारा आज भी उतनी ही प्रबल है, जितनी सदियों पहले थी।
देखें तस्वीरें