आस्था और अद्भुत रहस्य : काशी के तिल भांडेश्वर महादेव की अनोखी महिमा, हर साल तिल के बराबर बढ़ता है शिवलिंग का आकार 

बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी अपने प्राचीन मंदिरों और धार्मिक परंपराओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। इन्हीं प्राचीन शिवालयों में से एक है केदारेश्वर खंड स्थित तिल भाण्डेश्वर महादेव मंदिर, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित स्वयंभू शिवलिंग है। मान्यता है कि इस चमत्कारिक शिवलिंग का आकार हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन एक तिल के बराबर बढ़ता है। यही कारण है कि समय के साथ इसका स्वरूप विशाल होता चला गया है और यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया है।
 

स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन से ग्रह दोषों की शांति और मोक्ष की होती है प्राप्ति, सावन और सोमवार को उमड़ती है श्रद्धालुओं की भारी भीड़

हर साल मकर संक्रांति पर तिल के बराबर बढ़ता है स्वयंभू शिवलिंग का आकार 
 

सोमवार के दिन तिलभांडेश्वर महादेव के दर्शन को उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
 

दर्शन से नवग्रह और 27 नक्षत्रों के दोषों की होती है शांति, मोक्ष की प्राप्ति 


वाराणसी। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी अपने प्राचीन मंदिरों और धार्मिक परंपराओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। इन्हीं प्राचीन शिवालयों में से एक है केदारेश्वर खंड स्थित तिल भाण्डेश्वर महादेव मंदिर, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित स्वयंभू शिवलिंग है। मान्यता है कि इस चमत्कारिक शिवलिंग का आकार हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन एक तिल के बराबर बढ़ता है। यही कारण है कि समय के साथ इसका स्वरूप विशाल होता चला गया है और यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया है।

पांडेय हवेली की गली में स्थित यह प्राचीन मंदिर जमीन से लगभग 60 फीट ऊंचाई पर स्थित है। श्रद्धालु हाथों में गंगाजल, दूध और बेलपत्र लेकर 30 से अधिक सीढ़ियां चढ़कर भगवान शिव के दर्शन करने पहुंचते हैं। सावन माह और प्रत्येक सोमवार को यहां बड़ी संख्या में भक्त जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।

मंदिर के पुजारी विनय सिंह के अनुसार, यह शिवलिंग स्वयंभू है और इसका निचला भाग धरती के भीतर स्थित है, जबकि ऊपरी भाग श्रद्धालुओं को दिखाई देता है। मान्यता है कि यहां श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने से नवग्रह और 27 नक्षत्रों से जुड़े दोष शांत होते हैं। जिन लोगों की कुंडली में ग्रह दोष होते हैं, वे लगातार सोमवार को दर्शन और जलाभिषेक करते हैं तो उन्हें विशेष लाभ प्राप्त होता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, केदारेश्वर खंड में स्थित होने के कारण तिल भाण्डेश्वर महादेव के नियमित दर्शन और जलाभिषेक से भक्तों को भैरवी यातना से मुक्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस शिवलिंग का संबंध द्वापर युग से भी बताया जाता है।

प्राचीन कथा से जुड़ी है मान्यता
पौराणिक कथा के अनुसार, इस स्थान पर विभांडा ऋषि भगवान शिव की कठोर तपस्या करते थे। वे प्रतिदिन तिल और गंगाजल अर्पित कर शिव आराधना करते थे। एक दिन तप के दौरान उनके पात्र में रखा तिल भूमि पर बिखर गया, जिससे भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए। तिल से प्रकट होने के कारण इस शिवलिंग का नाम तिल भाण्डेश्वर महादेव पड़ा। मान्यता है कि द्वापर युग में यह शिवलिंग प्रतिदिन एक तिल के आकार में बढ़ता था, जबकि कलियुग में इसका आकार केवल मकर संक्रांति के दिन एक तिल बढ़ता है।