क्या अखिलेश ने किया बनारस के सफाईकमिर्यों का अपमान? सोशल मीडिया पर यूजर्स बोले तुम्हारी ही गंदगी साफ करने गटर में उतरते हैं 'सुरंगजीवी'

वाराणसी। काशी में सीवर लाइनों से बालू भरी बोरियां, पत्थर, लकड़ी का बुरादा, प्लाई और प्लास्टिक निकलने का मामला अब राजनीतिक और सोशल मीडिया की बहस में बदल गया है। शहर में हालिया जलभराव और सीवर ओवरफ्लो को लेकर पहले से सवाल उठ रहे थे, लेकिन मुख्य सीवर लाइनों के भीतर बड़ी मात्रा में ऐसी सामग्री मिलने के बाद नगर निगम ने इसके पीछे साजिश की आशंका जताई है। मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए तहरीर भी दी गई है।
 

 

वाराणसी। काशी में सीवर लाइनों से बालू भरी बोरियां, पत्थर, लकड़ी का बुरादा, प्लाई और प्लास्टिक निकलने का मामला अब राजनीतिक और सोशल मीडिया की बहस में बदल गया है। शहर में हालिया जलभराव और सीवर ओवरफ्लो को लेकर पहले से सवाल उठ रहे थे, लेकिन मुख्य सीवर लाइनों के भीतर बड़ी मात्रा में ऐसी सामग्री मिलने के बाद नगर निगम ने इसके पीछे साजिश की आशंका जताई है। मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए तहरीर भी दी गई है।

इसी बीच समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से सोशल मीडिया पर इस्तेमाल किए गए ‘सुरंगजीवी’ शब्द को लेकर नई बहस खड़ी हो गई है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स इस शब्द को सीवर और नालों में उतरकर सफाई करने वाले कर्मचारियों से जोड़ते हुए आपत्ति जता रहे हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक कटाक्ष अपनी जगह है, लेकिन ऐसा शब्द उन लोगों के सम्मान से जोड़कर भी देखा जा सकता है, जो सीवर की सफाई के लिए अपनी जान तक जोखिम में डालते हैं।

हालांकि, इस पूरे विवाद में दो बातें अलग-अलग हैं। सीवर लाइन में बोरियां और अन्य सामग्री किसने डाली, इसकी जांच अभी होनी है और किसी राजनीतिक दल की संलिप्तता साबित नहीं हुई है। वहीं ‘सुरंगजीवी’ शब्द को लेकर उठी आपत्ति सोशल मीडिया यूजर्स की व्याख्या और राजनीतिक बहस का हिस्सा है।

आधा दर्जन वार्डों की सीवर लाइन में मिली संदिग्ध सामग्री
मामले की शुरुआत वाराणसी के शिवाला, सरायनंदन, नगवा समेत करीब आधा दर्जन इलाकों में सीवर लाइनों की सफाई के दौरान हुई। मुख्य सीवर लाइनों से सामान्य गाद और कचरे के साथ बालू भरी बोरियां, पत्थर, लकड़ी का बुरादा, प्लाई और प्लास्टिक जैसी सामग्री मिलने की बात सामने आई।

नगर निगम प्रशासन ने इसे सामान्य तरीके से सीवर में पहुंचा कचरा मानने के बजाय जानबूझकर लाइन बाधित किए जाने की आशंका के रूप में लिया है। नगर निगम की ओर से मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए तहरीर दी गई है।

यही वह बिंदु है जहां से मामला केवल सीवर सफाई का नहीं रह गया। सवाल उठने लगा कि आखिर इतनी भारी बोरियां और दूसरी सामग्री मुख्य सीवर लाइन के भीतर कैसे पहुंचीं? अगर यह जानबूझकर किया गया तो इसके पीछे कौन था और उद्देश्य क्या था? इन सवालों का अंतिम जवाब पुलिस और प्रशासनिक जांच से ही सामने आएगा।

प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र होने से राजनीतिक रंग भी गहराया
वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। पिछले वर्षों में काशी में सड़क, घाट, कॉरिडोर, शहरी बुनियादी ढांचे और अन्य विकास परियोजनाओं को लेकर बड़े स्तर पर काम हुआ है। ऐसे में शहर में जलभराव और सीवर ओवरफ्लो की तस्वीरें राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय भी बनती रही हैं।

सीवर लाइनों के भीतर बोरियां और दूसरी सामग्री मिलने के बाद सोशल मीडिया के एक वर्ग में यह चर्चा भी शुरू हुई कि कहीं जानबूझकर व्यवस्था बाधित करके काशी के विकास और सरकार की छवि को निशाना बनाने की कोशिश तो नहीं की गई। फिलहाल इस आशंका को किसी विपक्षी दल से जोड़ने वाला कोई पुष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है। जांच का सबसे अहम सवाल यही है कि सामग्री किसने और किस उद्देश्य से सीवर में डाली।

‘सुरंगजीवी’ शब्द ने विवाद को दिया नया मोड़
इसी राजनीतिक माहौल के बीच अखिलेश यादव के ‘सुरंगजीवी’ शब्द को लेकर सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई। अखिलेश इससे पहले भी राजनीतिक विरोधियों पर कटाक्ष के लिए इस शब्द का प्रयोग कर चुके हैं। जुलाई 2026 में अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा विवाद के दौरान भी उन्होंने ‘सुरंगजीवी’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाने पर लिया था।

लेकिन वाराणसी के मौजूदा सीवर विवाद के संदर्भ में सोशल मीडिया यूजर्स इस शब्द के दूसरे मायने निकाल रहे हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि सीवर, नाले और भूमिगत लाइनों में उतरकर काम करने वाले सफाई कर्मचारियों और मजदूरों के संदर्भ में इस तरह के शब्द को किस रूप में देखा जाना चाहिए।

अवेश तिवारी ने पूछा- बनारसियों को कहा या भाजपाइयों को?
सोशल मीडिया पर अवेश तिवारी ने अखिलेश यादव के शब्द चयन पर सवाल उठाते हुए बनारस के ऐतिहासिक भूमिगत ढांचे का जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि जेम्स प्रिंसेप के समय से बनारस की सुरंगों और भूमिगत संरचनाओं का अपना इतिहास रहा है।

बनारस का डिजाइनर जेम्स प्रिंसिप सुरंगजीवी था। उसने बनारस शहर को सुरंगों और बावलियों का शहर बना दिया। एक वक्त था राजा चेतसिंह रामनगर के किले से घुसते थे नदेसर में स्थित टकसाल से निकलते हैं। यहां की सुरंगों में हाथी भी घुस सकता था।

अब आप सुरंगजीवी बनारसियों को कह रहे हैं या… https://t.co/VCDqnPe1P7

— Awesh Tiwari (@awesh29) September 13, 2026


उन्होंने सवाल किया कि ‘सुरंगजीवी’ शब्द बनारसियों के लिए इस्तेमाल किया गया है या भाजपाइयों के लिए? अगर इसे बनारस के लोगों के संदर्भ में कहा गया है तो यह अपमानजनक है।

इसके साथ ही उन्होंने एक दूसरा गंभीर मुद्दा भी उठाया। उन्होंने लिखा कि आज भी समाज के वंचित तबकों के लोग सीवर लाइनों में उतरकर सफाई करने को मजबूर हैं। हालांकि उन्होंने वाराणसी की मौजूदा सीवर व्यवस्था के लिए केवल किसी एक राजनीतिक दल को जिम्मेदार ठहराने के बजाय सपा, बसपा और भाजपा तीनों के शासनकाल पर सवाल उठाया और कहा कि शहर के सीवेज सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए लंबे समय तक पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई गई।

‘क्या आप कभी सीवर में उतरे हैं?’
कुश वायस नाम के एक यूजर ने भी अखिलेश यादव के शब्दों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल किया कि क्या अखिलेश यादव स्वयं कभी सीवर में उतरे हैं? उन्होंने कहा कि राजनीतिक मुद्दे पर विरोध किया जा सकता है, लेकिन ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से बचना चाहिए जिनका अर्थ जमीन पर कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले लोगों से भी जुड़ सकता है।

अखिलेश जी, क्या आप कभी सिवरेज में उतरे हो ? या फिर ऐसा करें यूपी में सीवर सफ़ाई का टेंडर आप ले लीजिए और अपने सजातीयों से सीवर अच्छे से साफ़ करवायें, सभी आपके कसीदे पड़ेंगे वरना आपका मुद्दा कुछ भी हो सस्ते शब्द मत लिखिए जिनकी समझ आपको ना हो। https://t.co/o1MRkUBdL0

— Kush Voice (@Kush_voice) September 13, 2026


एक अन्य यूजर ने लिखा कि “सुरंग में कोई यूं ही नहीं उतरता, जान की बाजी लगाकर सफाई करने वाले मजदूर उतरते हैं।”
सोशल मीडिया पर इसी तरह की कई प्रतिक्रियाओं में मुद्दा राजनीतिक कटाक्ष से हटकर सफाई कर्मचारियों के सम्मान तक पहुंच गया है। लोगों का तर्क है कि सीवर या नाले में उतरना किसी व्यक्ति को छोटा नहीं बनाता, बल्कि वह शहर को साफ रखने के लिए सबसे कठिन काम करने वालों में शामिल है।

असली सवाल- बोरियां सीवर तक पहुंचीं कैसे?
राजनीतिक बयानबाजी और सोशल मीडिया की बहस से अलग इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल अभी अनुत्तरित है—मुख्य सीवर लाइन में बालू से भरी बोरियां, पत्थर, प्लाई और दूसरी सामग्री आखिर पहुंची कैसे?

नगर निगम की साजिश की आशंका गंभीर इसलिए है क्योंकि यह सामग्री उन इलाकों में मिली है जहां बारिश के दौरान जलभराव और सीवर ओवरफ्लो की समस्या सामने आई थी। यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी ने जानबूझकर सीवर लाइन बाधित की, तो मामला सामान्य नागरिक लापरवाही या सफाई व्यवस्था की कमी से कहीं आगे निकल जाएगा।

लेकिन जब तक जांच किसी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल की भूमिका स्थापित नहीं करती, तब तक इसे विपक्ष या किसी खास दल की साजिश घोषित करना तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी।