नागपंचमी पर प्राचीन नागकुआं मंदिर में उमड़े आस्थावान, नागराज कारकोटक से जुड़ा है नागकूप का रहस्य, जानिये महात्म्य 

श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी नागपंचमी के पावन पर्व पर काशी के ऐतिहासिक प्राचीन नागकुआं मंदिर (कारकोटक वापी) में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों का तांता लगा रहा। श्रद्धालुओं ने नागकुंड में दूध, लावा और जल अर्पित कर नागदेवता की पूजा की। इसके साथ ही नागेश्वर महादेव का दर्शन-पूजन कर जल, दूध, तुलसी की माला और लावा चढ़ाया। मंदिर परिसर हर-हर महादेव और नागदेवता के जयघोष से गूंजता रहा।
 

कारकोटक वापी में श्रद्धालुओं ने नागदेवता को दूध, लावा और जल अर्पित कर की पूजा, नागेश्वर महादेव का किया अभिषेक

 महंत ने बताया मंदिर का पौराणिक महत्व, स्कंद पुराण के काशी खंड में कर्कोटक वापी का वर्णन, नागराज कारकोटक की तपस्या से जुड़ा है स्थान

 भक्तों ने नागेश्वर महादेव को चढ़ाया जल, दूध, तुलसी की माला और लावा

 कारकोटक वापी से नागलोक जाता है रास्ता, महर्षि पतंजलि की तपस्या से भी जुड़ा है स्थल 

 गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के स्वयंभू और अनादि होने की मान्यता 

वाराणसी। श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी नागपंचमी के पावन पर्व पर काशी के ऐतिहासिक प्राचीन नागकुआं मंदिर (कारकोटक वापी) में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों का तांता लगा रहा। श्रद्धालुओं ने नागकुंड में दूध, लावा और जल अर्पित कर नागदेवता की पूजा की। इसके साथ ही नागेश्वर महादेव का दर्शन-पूजन कर जल, दूध, तुलसी की माला और लावा चढ़ाया। मंदिर परिसर हर-हर महादेव और नागदेवता के जयघोष से गूंजता रहा।

मंदिर के महंत आचार्य कुंदन पांडे ने नागपंचमी के अवसर पर मंदिर की धार्मिक परंपराओं और पौराणिक महत्व की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि काशी में नागकुआं को नागदेवता की आराधना के प्रमुख और अत्यंत पवित्र स्थलों में माना जाता है। श्रावण शुक्ल पंचमी को यहां विशेष पूजन की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

स्कंद पुराण में मिलता है कारकोटक वापी का उल्लेख
महंत आचार्य कुंदन पांडे के अनुसार प्राचीन नागकुआं मंदिर का वर्णन स्कंद पुराण के काशी खंड में कारकोटक वापी के नाम से मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार राजा परीक्षित की सर्पदंश से मृत्यु के बाद उनके पुत्र राजा जन्मेजय ने नाग जाति के विनाश के लिए सर्प सत्र यज्ञ कराया था। यज्ञ में बड़ी संख्या में सर्प भस्म होने लगे।

नागों के राजा कारकोटक ने अपनी प्रजा और नाग जाति की रक्षा के लिए इसी स्थान पर नागेश्वर महादेव की घोर तपस्या की। भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें शरण प्रदान की। मान्यता है कि इसी के बाद यहां कारकोटेश्वर शिवलिंग की स्थापना हुई।

नागलोक जाने का द्वार मानी जाती है कारकोटक वापी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कारकोटक नाग अपनी पूरी नाग जाति के साथ इसी स्थान से नागलोक गए थे। इसी वजह से कारकोटक वापी को नागलोक जाने का द्वार भी माना जाता है। मंदिर की धार्मिक परंपराओं में इस मान्यता का विशेष स्थान है।

महर्षि पतंजलि की तपस्या से भी जुड़ा है स्थल
महंत के अनुसार नागकुआं का संबंध महर्षि पतंजलि की तपस्या से भी माना जाता है। यह स्थान अनादि काल से आध्यात्मिक साधना का केंद्र रहा है। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है। श्रद्धालुओं की आस्था है कि यह शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ और इसकी महिमा युगों से चली आ रही है।

प्रमुख मान्यताएं
नागपंचमी पर मंदिर में उमड़ी भीड़ ने एक बार फिर काशी की प्राचीन धार्मिक परंपराओं और लोक आस्था की गहरी जड़ों को उजागर किया। दिनभर श्रद्धालु नागदेवता और नागेश्वर महादेव के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते रहे।