आईपीएल सट्टेबाजी के नाम पर 700 करोड़ की साइबर ठगी, 2000 से अधिक बैंक खातों और क्रिप्टो नेटवर्क की जांच में जुटी वाराणसी पुलिस
वाराणसी। आईपीएल में सट्टेबाजी के नाम पर लोगों को मोटे मुनाफे का लालच देकर करीब 700 करोड़ रुपये की साइबर ठगी करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह की जांच अब और तेज कर दी गई है। यह मामला क्राइम ब्रांच से स्थानांतरित होकर साइबर क्राइम थाने को सौंप दिया गया है, जहां साइबर विशेषज्ञों की टीम बैंक खातों, डिजिटल ट्रांजैक्शन, क्रिप्टोकरेंसी और हवाला नेटवर्क की गहन पड़ताल कर रही है। शुरुआती जांच में हजारों बैंक खातों के जरिए करोड़ों रुपये के लेनदेन और विदेशी कनेक्शन के संकेत मिले हैं।
साइबर क्राइम पुलिस के अनुसार जांच में सामने आया है कि मुंबई से संचालित कथित 'मलिक फर्म' के माध्यम से 2000 से अधिक बैंक खातों का इस्तेमाल कर बड़ी मात्रा में धनराशि का लेनदेन किया गया। ठगी से प्राप्त रकम को पहले अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया जाता था और फिर उसे क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर विदेश, विशेष रूप से खाड़ी देशों तक पहुंचाया जाता था। इसके अलावा हवाला नेटवर्क के जरिए उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली सहित कई राज्यों में भी धन भेजे जाने के साक्ष्य मिले हैं।
जांच के दौरान पुलिस ने गिरोह के सरगना रितेश दिवाकर शुक्ला, निवासी यशवंत विहार टाउनशिप, नालासोपारा ईस्ट (पालघर, महाराष्ट्र) सहित 13 आरोपियों के बैंक खातों का विश्लेषण किया। इसमें पता चला कि केवल 30 दिनों के भीतर करीब 25 करोड़ रुपये का लेनदेन किया गया। मई महीने में ही लगभग 25 करोड़ रुपये 300 से अधिक बैंक खातों में ट्रांसफर किए गए थे। पुलिस का मानना है कि इस नेटवर्क के माध्यम से धनराशि को लगातार विभिन्न खातों में घुमाकर जांच एजेंसियों से छिपाने की कोशिश की गई।
पुलिस के मुताबिक, गिरोह सोशल मीडिया और विशेष रूप से टेलीग्राम चैनलों के जरिए लोगों को आईपीएल सट्टे में निवेश कर भारी मुनाफा कमाने का झांसा देता था। निवेशकों से रकम जमा कराने के बाद उसे कई बैंक खातों में भेजा जाता और तुरंत क्रिप्टोकरेंसी में परिवर्तित कर विदेश भेज दिया जाता था, जिससे धन के वास्तविक स्रोत और अंतिम गंतव्य का पता लगाना मुश्किल हो सके।
1 जून को कैंट पुलिस और क्राइम ब्रांच की संयुक्त टीम ने वाराणसी के टकटकपुर स्थित एक अपार्टमेंट में छापेमारी कर इस गिरोह के 13 सदस्यों को गिरफ्तार किया था। कार्रवाई के दौरान आरोपियों के कब्जे से करीब एक करोड़ रुपये मूल्य की क्रिप्टोकरेंसी भी बरामद की गई थी। इसके बाद मामले की जांच साइबर क्राइम थाने को सौंप दी गई।
पूछताछ में खुलासा हुआ कि गिरोह का संचालन बेहद संगठित तरीके से किया जा रहा था। मुख्य आरोपी रितेश दिवाकर शुक्ला लंबे समय से मुंबई में रहकर साइबर अपराधियों के संपर्क में आया था। वहां कथित मलिक फर्म की ओर से उसे और उसके साथियों को करीब दस दिनों का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उसने अपने परिचित युवकों को इस नेटवर्क से जोड़कर वाराणसी समेत पूर्वांचल के कई क्षेत्रों में साइबर ठगी का जाल फैलाया।
जांच में यह भी सामने आया है कि रितेश ने चोलापुर निवासी रवि यादव, सुल्तानपुर निवासी अर्पित तिवारी, सिंधोरा निवासी अमन सिंह, जौनपुर निवासी विकास पटेल समेत कई लोगों को इस नेटवर्क में शामिल किया। इनके माध्यम से सोशल मीडिया और टेलीग्राम प्लेटफॉर्म पर निवेश संबंधी विज्ञापन चलाकर लोगों को आईपीएल सट्टे में भारी लाभ का लालच दिया जाता था।
साइबर विशेषज्ञों की जांच में ठगी से अर्जित धन को रियल एस्टेट और हवाला नेटवर्क के जरिए खपाए जाने के भी संकेत मिले हैं। लखनऊ, वाराणसी और कानपुर सहित कई शहरों में संपत्तियों और रियल एस्टेट परियोजनाओं में निवेश की जानकारी सामने आई है। पुलिस अब इन संपत्तियों, बैंक खातों और निवेश के स्रोतों की भी जांच कर रही है।
सहायक पुलिस आयुक्त (साइबर) विदुष सक्सेना ने बताया कि जेल में बंद आरोपियों को पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ की जाएगी। जांच का मुख्य उद्देश्य पूरे साइबर नेटवर्क, विदेशी संपर्कों, कथित मलिक फर्म की भूमिका, क्रिप्टो वॉलेट्स और ठगी की रकम के वास्तविक प्रवाह का पता लगाना है। पुलिस का मानना है कि जांच आगे बढ़ने पर इस अंतरराज्यीय साइबर गिरोह से जुड़े कई और लोगों की पहचान होने के साथ-साथ करोड़ों रुपये की ठगी के पूरे नेटवर्क का भी खुलासा हो सकता है।