बीएचयू के प्रश्न पत्र में ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ शब्द पर विवाद, अकादमिक बहस से राजनीतिक सरगर्मी तेज

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के बीच प्रदेश की राजनीति में जातीय विमर्श और सामाजिक शब्दावली को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। इसी बीच काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की एमए इतिहास की परीक्षा में पूछे गए एक सवाल ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। प्रश्न पत्र में “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” शब्द के प्रयोग को लेकर राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
 

वाराणसी। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के बीच प्रदेश की राजनीति में जातीय विमर्श और सामाजिक शब्दावली को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। इसी बीच काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की एमए इतिहास की परीक्षा में पूछे गए एक सवाल ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। प्रश्न पत्र में “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” शब्द के प्रयोग को लेकर राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

यह मामला बीएचयू के एमए इतिहास चौथे सेमेस्टर की परीक्षा से जुड़ा है। ‘आधुनिक भारतीय समाज में महिलाएं’ विषय के प्रश्न पत्र में छात्रों से पूछा गया था-“ब्राह्मणवादी पितृसत्ता शब्द से आप क्या समझते हैं? चर्चा कीजिए कि किस प्रकार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में बाधा डाली।”

प्रश्न सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद इसे लेकर बहस शुरू हो गई। कुछ लोगों ने इसे समाजशास्त्र और इतिहास के अध्ययन का हिस्सा बताते हुए सामान्य अकादमिक प्रश्न माना, जबकि कई संगठनों और बुद्धिजीवियों ने इसे समाज में वैमनस्य पैदा करने वाला और एक विशेष वर्ग की भावनाओं को आहत करने वाला प्रश्न बताया।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रदेश में चुनावी माहौल बनने के कारण इस तरह के मुद्दे तेजी से राजनीतिक रंग ले रहे हैं। समाजवादी पार्टी पहले से ही पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को लेकर सक्रिय है। हाल ही में सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी के एक बयान पर भी विवाद हुआ था, जिसके बाद उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी थी। ऐसे माहौल में बीएचयू का यह प्रश्न पत्र चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।

इतिहासकारों और शिक्षकों की राय भी इस मामले में अलग-अलग है। कई शिक्षाविदों का कहना है कि “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” शब्द कोई नया शब्द नहीं है, बल्कि समाजशास्त्र और इतिहास के अकादमिक विमर्श में लंबे समय से प्रयुक्त होता रहा है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल संवेदनशीलता के साथ किया जाना चाहिए।

इतिहास की प्राध्यापक अनुराधा सिंह ने कहा कि शब्द और सामाजिक अवधारणाएं समय के साथ बदलती रहती हैं। उनके अनुसार 1990 के दशक में यह शब्द अकादमिक जगत में अधिक प्रचलन में आया था, लेकिन आज के समय में इसका प्रयोग विवाद और सामाजिक विभाजन को बढ़ाने वाला माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्राचीन समाज और महिलाओं की स्थिति का अध्ययन करते समय संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

उन्होंने यह भी कहा कि समाज में कई परंपराएं और शब्द समय के साथ बदलते रहे हैं, इसलिए किसी एक वर्ग को केंद्र में रखकर दूसरे वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाना उचित नहीं माना जा सकता। उधर बीएचयू प्रशासन ने पूरे विवाद पर सफाई देते हुए कहा है कि परीक्षा में पूछा गया प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम का हिस्सा था और इसे पूरी तरह अकादमिक संदर्भ में रखा गया था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में विभिन्न सामाजिक अवधारणाओं और ऐतिहासिक दृष्टिकोणों पर चर्चा शिक्षा प्रक्रिया का हिस्सा होती है। प्रशासन का कहना है कि प्रश्न को किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं देखा जाना चाहिए।