IIT BHU में धरोहर संरक्षण पर मंथन, विशेषज्ञों ने सामुदायिक भागीदारी पर दिया जोर
वाराणसी। आईआईटी बीएचयू में सोमवार को “भारत में धरोहर संरक्षण स्थान, प्रक्रिया और लोगों का मूल्यांकन” विषय पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान एवं गोलमेज चर्चा का आयोजन किया गया। यह वास्तुकला, योजना एवं अभिकल्प विभाग द्वारा मानवतावादी अध्ययन विभाग के सहयोग से भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं धरोहर श्रृंखला के अंतर्गत आयोजित चर्चा में विशेषज्ञों ने सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. रबी नारायण मोहंती के स्वागत संबोधन से हुआ, जिसमें उन्होंने विभाग की धरोहर अध्ययन के क्षेत्र में विशेषज्ञता विकसित करने की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। इसके बाद प्रो. पी. के. पांडा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि वर्तमान समय में धरोहर संरक्षण केवल ऐतिहासिक महत्व का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। उन्होंने अकादमिक शोध और व्यावहारिक कार्यों के बीच समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए प्रो. अमिता सिन्हा ने इस पहल को ज्ञान और संवाद का प्रभावी मंच बताया। इसके उपरांत विभाग के विद्यार्थियों ने सांस्कृतिक संरक्षण और सतत विकास से जुड़े अपने प्रोजेक्ट्स प्रस्तुत किए, जिन्हें सराहा गया। मुख्य व्याख्यान डॉ. शिखा जैन, संस्थापक-निदेशक, DRONAH द्वारा दिया गया। उन्होंने धरोहर संरक्षण को व्यापक दृष्टिकोण से समझाने पर बल देते हुए कहा कि इसे केवल ऐतिहासिक इमारतों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके अंतर्गत प्राकृतिक परिवेश, सांस्कृतिक परंपराएं और जीवित विरासत भी शामिल हैं। उन्होंने यूनेस्को सहित विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए सांस्कृतिक परिदृश्य और समुदाय आधारित संरक्षण की आवश्यकता को प्रमुखता दी।
कार्यक्रम का समापन प्रो. विनीता चंद्रा के संयोजन में आयोजित गोलमेज चर्चा से हुआ, जिसमें काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विशेषज्ञों ने भाग लिया। चर्चा में वाराणसी को संभावित विश्व धरोहर शहर के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर विस्तार से विचार किया गया। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि वाराणसी जैसे जीवंत शहर में धरोहर संरक्षण के लिए शहरी विकास और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
अंत में डॉ. विशाल चेतरी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि धरोहर संरक्षण के लिए समन्वित, संवेदनशील और सहभागी दृष्टिकोण अपनाना समय की आवश्यकता है, खासकर ऐसे शहरों में जहां इतिहास और आधुनिकता साथ-साथ चलते हैं।