बीएचयू का तेलुगु विभाग : शिक्षकों की कमी, तूल पकड़ रहा निलंबित प्रोफेसर की बहाली का मामला, पठन-पाठन व शोध कार्य प्रभावित
वाराणसी। बीएचयू के तेलुगु विभाग पर इन दिनों दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ शिक्षकों की भारी कमी ने शैक्षणिक व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है, तो दूसरी ओर निलंबित प्रोफेसर की बहाली का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। यह मामला अब विश्वविद्यालय की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था Executive Council BHU (ईसी) के समक्ष रखने की तैयारी में है। इन परिस्थितियों ने विभाग के सामने प्रशासनिक और शैक्षणिक दोनों स्तरों पर गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
विभाग में लंबे समय से रिक्त पदों की समस्या बनी हुई है। वर्तमान में तीन असिस्टेंट प्रोफेसर और एक एसोसिएट प्रोफेसर के पद खाली हैं, जिसके कारण नियमित कक्षाओं का संचालन और शोध कार्यों का मार्गदर्शन प्रभावित हो रहा है। हालात तब और जटिल हो गए जब 28 फरवरी को विभागाध्यक्ष प्रो. सी.एस. रामचंद्र मूर्ति सेवानिवृत्त हो गए। हालांकि शैक्षणिक सत्र को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनसे जून तक सेवाएं जारी रखने का अनुरोध किया है, ताकि पढ़ाई का क्रम पूरी तरह बाधित न हो।
शिक्षकों की कमी का सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। विभाग में इस समय स्नातक स्तर पर लगभग 45 छात्र, परास्नातक में पांच और पीएचडी के तीन शोधार्थी नामांकित हैं। लेकिन पर्याप्त शिक्षकों के अभाव और एक प्रोफेसर के निलंबन के चलते कक्षाएं नियमित रूप से नहीं चल पा रही हैं। शोध कार्यों के मार्गदर्शन में भी बाधाएं आ रही हैं, जिससे छात्रों की शैक्षणिक प्रगति प्रभावित होने की आशंका है।
इन परिस्थितियों से निपटने के लिए विभाग ने अस्थायी समाधान अपनाया है। सत्र के बीच उत्पन्न इस संकट को देखते हुए तीनों शोधार्थियों को ही शिक्षण कार्य की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। विभाग का उद्देश्य है कि किसी तरह पाठ्यक्रम समय पर पूरा कराया जा सके और छात्रों को आगामी परीक्षाओं में परेशानी न हो। हालांकि यह व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं मानी जा रही, लेकिन फिलहाल इसे मजबूरी में लागू किया गया है।
इसी बीच निलंबित प्रोफेसर की बहाली का मुद्दा भी तेजी से उभर रहा है। संबंधित प्रोफेसर ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखकर अपनी बहाली की मांग की है। अब इस प्रकरण को कार्यकारी परिषद के समक्ष रखने की तैयारी चल रही है। परिषद के निर्णय के बाद ही यह तय होगा कि प्रोफेसर की सेवा बहाल की जाएगी या नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय प्रशासन की चुनौतियों को बढ़ा दिया है। एक ओर शिक्षकों की कमी को दूर करना आवश्यक है, तो दूसरी ओर प्रशासनिक विवादों का समाधान भी जरूरी हो गया है। विभाग और प्रशासन दोनों इस कोशिश में हैं कि किसी भी तरह शैक्षणिक सत्र सुचारु रूप से चलता रहे और छात्रों के भविष्य पर इसका नकारात्मक प्रभाव न पड़े।