बीएचयू के वैज्ञानिकों ने बच्चों के लिए खोली विज्ञान की नई दुनिया, डीएनए से निएंडरथल तक की कराई रोमांचक यात्रा
वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के जंतु विज्ञान विभाग की ज्ञान लैब द्वारा एक निजी विद्यालय के बाबतपुर कैंपस में आयोजित विशेष आउटरीच कार्यक्रम ने स्कूली विद्यार्थियों को विज्ञान के कई अनछुए और रोचक पहलुओं से परिचित कराया। "टिक-टॉक, जीन्स एंड अस: अनलॉकिंग द साइंस ऑफ लाइफ" विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच विकसित करना, जटिल वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल भाषा में समझाना और विज्ञान के प्रति उनकी जिज्ञासा को बढ़ावा देना था।
कार्यक्रम में बीएचयू के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन, पोस्टर प्रदर्शनी और संवादात्मक सत्रों के माध्यम से जीव विज्ञान, आनुवंशिकी, मानव विकास और आधुनिक वैज्ञानिक शोध से जुड़े विषयों पर विस्तार से जानकारी दी। विद्यार्थियों ने विशेषज्ञों से सीधे संवाद कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया।
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. प्रज्ञा वर्मा के व्याख्यान से हुई। उन्होंने 'टिक-टॉक ऑफ द बायोलॉजिकल क्लॉक' विषय पर शरीर की जैविक घड़ी और क्रोनोटाइप की अवधारणा को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने बताया कि हर व्यक्ति के सोने, जागने और कार्य करने का सर्वोत्तम समय अलग-अलग होता है और यह केवल आदत नहीं बल्कि हमारे शरीर और जीन्स से जुड़ी प्राकृतिक प्रक्रिया है।
इसके बाद दीपांशी अग्रवाल ने जीव विज्ञान और गणित के संबंधों को रोचक तरीके से प्रस्तुत किया। उन्होंने 'हिल्बर्ट्स होटल पैराडॉक्स' का उदाहरण देकर विद्यार्थियों को अनंत (इन्फिनिटी) जैसी जटिल अवधारणा को सहज रूप में समझाया। वहीं शैलेश देसाई ने पशुओं के घरेलूकरण की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए बताया कि हजारों वर्ष पूर्व मनुष्य द्वारा जंगली पशुओं को पालतू बनाए जाने से सभ्यता और जीवनशैली में बड़ा परिवर्तन आया। उन्होंने उत्तर भारत में लगभग पांच हजार वर्ष पुराने सुअर के घरेलूकरण से जुड़े वैज्ञानिक प्रमाणों का भी उल्लेख किया।
जेनेटिक्स विषय पर चंचल देवनानी ने विद्यार्थियों को बताया कि डीएनए केवल शरीर की संरचना का आधार नहीं, बल्कि मानव इतिहास की जीवंत कहानी भी है। उन्होंने सिंधी जीनोम पर हुए नवीनतम वैज्ञानिक अध्ययन का उल्लेख करते हुए समझाया कि हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका में हजारों वर्षों से हमारे पूर्वजों के प्रवास, जीवनशैली और विकास का इतिहास सुरक्षित रहता है।
मनोज थारू ने थारू जनजाति के जीवन और उनके आनुवंशिक विकास पर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि तराई क्षेत्र में लंबे समय तक रहने के कारण इस समुदाय में ऐसे आनुवंशिक परिवर्तन विकसित हुए हैं, जिनके कारण उन पर मलेरिया जैसी बीमारी का प्रभाव अपेक्षाकृत कम देखा जाता है। वहीं कार्यक्रम के अंतिम व्याख्यान में प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने 'हम कौन हैं?' विषय पर भारतीय आबादी की आनुवंशिक संरचना, प्राचीन जनजातियों और आधुनिक डीएनए अध्ययनों के आधार पर मानव विकास की रोचक जानकारी साझा की।
प्रस्तुति सत्र के बाद आयोजित पोस्टर प्रदर्शनी में विद्यार्थियों ने वैज्ञानिकों के साथ सीधे संवाद किया। दीक्षा कुमारी ने डीएनए फिंगरप्रिंटिंग और अपराध जांच में उसकी उपयोगिता समझाई। अभिषेक एवं अपर्णा एच.आर. ने कार्डियोमायोपैथी जैसी हृदय संबंधी बीमारी के वैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा की, जबकि अभिषेक कुमार ने निएंडरथल और डेनिसोवन जैसी प्राचीन मानव प्रजातियों तथा आधुनिक मानव से उनके संबंधों पर विद्यार्थियों को रोचक जानकारी दी।
विद्यालय की प्राचार्या सुधा सिंह ने कहा कि संस्थान का उद्देश्य विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नवाचार और शोध की संस्कृति से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम विद्यार्थियों में जिज्ञासा, तार्किक चिंतन और अनुसंधान की भावना विकसित करते हैं तथा उन्हें विज्ञान को एक बेहतर करियर विकल्प के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
कार्यक्रम का संचालन दिव्यांशी ने किया, जबकि समन्वय की जिम्मेदारी वैभव श्रीवास्तव और अपर्णा गांगुली ने निभाई। बीएचयू की ज्ञान लैब समय-समय पर ऐसे आउटरीच कार्यक्रम आयोजित कर प्रयोगशाला के ज्ञान को विद्यालयों और समाज तक पहुंचाने का कार्य कर रही है, जिससे नई पीढ़ी में वैज्ञानिक चेतना और शोध के प्रति रुचि विकसित हो सके।