बरेका में ढाई घंटे के रूपक के बाद होगा रावण का पुतला दहन का शोर, दशहरे की तैयारी अंतिम चरण में
18 अक्टूबर को होगा फुल ड्रेस रिहर्सल, 20 अक्टूबर को केंद्रीय खेल मैदान में रामलीला के बाद होगा रावण वध
56 वर्षों से चली आ रही दशहरा परंपरा में इस बार कई बदलाव, 70 फीट का रावण, 65 फीट का कुंभकर्ण और 60 फीट का मेघनाद होगा आकर्षण का केंद्र
रिपोर्ट - ओमकारनाथ
वाराणसी। बनारस रेल इंजन कारखाना (बरेका) के केंद्रीय खेल मैदान में इस बार दशहरा समारोह को भव्य रूप देने की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। 20 अक्टूबर को होने वाले आयोजन में करीब ढाई घंटे के रूपक के जरिए रामायण के प्रमुख प्रसंगों का मंचन किया जाएगा। राम वनगमन से लेकर रावण वध तक की कथा पांच दृश्यावलियों में दिखाई जाएगी। इसके बाद रात करीब साढ़े सात बजे विशालकाय रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन होगा। समारोह की तैयारियों के तहत 18 अक्टूबर को केंद्रीय खेल मैदान में पूर्ण मैदान अभ्यास भी किया जाएगा।
बरेका का दशहरा समारोह केवल पुतला दहन तक सीमित नहीं रहता। यहां हर साल बड़ी संख्या में लोग रामलीला के रूपक और इसके बाद होने वाले पुतला दहन को देखने पहुंचते हैं। इस बार आयोजन में पुतलों के निर्माण से लेकर रूपक के मंचन तक कई स्तर पर बदलाव किए गए हैं। पुतलों को तैयार करने वाले कारीगरों की कई पीढ़ियों का अनुभव भी इस आयोजन में नजर आएगा।
पांच दृश्यावलियों में दिखेगी रामायण की कथा
दशहरा समारोह में करीब ढाई घंटे का रूपक मुख्य आकर्षण रहेगा। बरेका संस्थान के हॉल में रूपक की तैयारियों और रिहर्सल का दौर पूरा किया जा चुका है। रूपक निदेशक एसडी सिंह की देखरेख में कलाकारों ने संवाद और दृश्यों का अभ्यास किया है। रूपक में पांच दृश्यावलियों के माध्यम से राम वनगमन, लंका प्रसंग, युद्ध और रावण वध तक की कथा प्रस्तुत की जाएगी। मंचन में संवादों के साथ गीतों को भी शामिल किया गया है। 20 अक्टूबर को शाम चार बजे कलाकार केंद्रीय खेल मैदान पहुंचेंगे और साढ़े चार बजे रूपक का मंचन शुरू होगा। करीब ढाई घंटे बाद पुतला दहन का कार्यक्रम होगा।
70 फीट का रावण, 65 फीट कुंभकर्ण और 60 फीट मेघनाद
इस बार बरेका में 70 फीट ऊंचे रावण का पुतला तैयार किया जा रहा है। कुंभकर्ण का पुतला 65 फीट और मेघनाद का पुतला 60 फीट ऊंचा होगा। निर्माण में करीब 150 पीस बांस, 500 किलो गत्ता, 100 किलो तांत और 25 लीटर रंग का इस्तेमाल किया जा रहा है। तीनों पुतलों के परिधान के लिए लगभग 350 मीटर रेशमी कपड़ा लगाया जा रहा है।
कारीगरों के मुताबिक इस बार पुतलों की संरचना को पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक तरीके से तैयार किया जा रहा है, ताकि उन्हें मैदान में खड़ा करने में कम परेशानी हो। दशहरे से दो-तीन दिन पहले पुतलों को केंद्रीय खेल मैदान में खड़ा करने की तैयारी है।
बारिश से बचाव के लिए बदली पुतलों की निर्माण शैली
पुतला निर्माण से जुड़े शमशाद के अनुसार, अब तक पुतलों पर कपड़ा लगाने के बाद कागज चिपकाकर उनका अंतिम स्वरूप तैयार किया जाता था। बारिश की स्थिति में कागज खराब होने और पुतलों को नुकसान पहुंचने की आशंका बनी रहती थी। इस बार इस प्रक्रिया में बदलाव किया गया है। उन्होंने बताया कि इस बार तीनों पुतलों पर दो लेयर का कपड़ा लगाया जा रहा है। इससे पुतलों के बाहरी हिस्से को अपेक्षाकृत सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। पुतलों के परिधान में भी बदलाव किया गया है।
तीन पीढ़ियों से पुतला निर्माण
शमशाद का परिवार करीब तीन पीढ़ियों से बरेका में दशहरा समारोह के लिए पुतले तैयार करता आ रहा है। उन्होंने बताया कि पुतला बनाने की कला उन्होंने अपने दादा और पिता से सीखी। बचपन से ही इस काम को देखते और सीखते हुए अब वह स्वयं परिवार की अगली पीढ़ी को यह कला सिखा रहे हैं।
इस बार परिवार के महिला और पुरुष सदस्यों समेत करीब 15 लोग पुतला निर्माण में जुटे हैं। शमशाद के अनुसार परिवार के बच्चों को भी रामायण और राम-रावण की कथा के बारे में जानकारी है। उनका परिवार वर्षों से इस आयोजन से जुड़ा है और इसे धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक सौहार्द की मिसाल के तौर पर भी देखता है।
कुछ मिनट में राख हो जाएंगे विशालकाय पुतले
रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों में आतिशी सामग्री भी लगाई जाती है। दहन के दौरान इनके फटने की आवाज पूरे खेल मैदान में गूंजती है। कारीगरों के मुताबिक इससे पुतलों के भीतर आग तेजी से फैलती है और दहन का कार्यक्रम कम समय में पूरा हो जाता है। पुतलों को खड़ा करने के लिए मशीन की मदद ली जाती है। निर्माण पूरा होने के बाद इन्हें दशहरे से दो-तीन दिन पहले मैदान में स्थापित किया जाएगा।
लाखों की भीड़, तीन-चार किलोमीटर पैदल पहुंचते हैं दर्शक
बरेका का दशहरा समारोह आसपास के क्षेत्र ही नहीं, बल्कि वाराणसी और दूसरे जिलों के लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। रामलीला के रूपक और पुतला दहन को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग केंद्रीय खेल मैदान पहुंचते हैं। आयोजन के दिन बरेका के कई गेट बंद कर दिए जाते हैं और दर्शकों को निर्धारित प्रवेश मार्गों से पैदल मैदान तक पहुंचाया जाता है।
कई लोग तीन से चार किलोमीटर तक पैदल चलकर समारोह स्थल तक पहुंचते हैं। रूपक के दौरान दर्शक रामायण के प्रसंगों का मंचन देखते हैं और इसके बाद श्रीराम द्वारा रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के दहन का दृश्य देखते हैं। मोबाइल कैमरों में लोग इस पल को कैद करते नजर आते हैं।
सुरक्षा के लिए तैनात रहेंगे पुलिस और बरेका सुरक्षाकर्मी
भीड़ को देखते हुए दशहरा समारोह में सुरक्षा व्यवस्था भी व्यापक स्तर पर की जाती है। बरेका के प्रवेश द्वारों और खेल मैदान के आसपास पुलिसकर्मियों के साथ बरेका सुरक्षा बल की तैनाती रहती है। भीड़ को नियंत्रित करने और अनधिकृत प्रवेश रोकने के लिए सभी प्रमुख गेटों पर निगरानी रखी जाती है। पुतला दहन स्थल के आसपास भी सुरक्षा घेरा बनाया जाता है, ताकि दर्शक निर्धारित दूरी से ही कार्यक्रम देख सकें। आयोजन के दौरान भीड़ की आवाजाही को नियंत्रित करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
56 साल की परंपरा में इस बार बदलाव
बरेका में वर्ष 1970 से दशहरा समारोह के दौरान रावण के पुतले का दहन किया जा रहा है। इस वर्ष 56 साल पुरानी परंपरा में बदलाव करते हुए पहली बार एक सिर वाले रावण का पुतला तैयार किया जा रहा है। हालांकि आयोजन में बदलाव का सबसे बड़ा केंद्र पुतले का स्वरूप ही नहीं, बल्कि उसकी निर्माण शैली, परिधान और मंचन को भी बनाया गया है।
आयोजकों और कारीगरों की तैयारियों को देखते हुए इस बार बरेका का दशहरा समारोह कई मायनों में खास रहने वाला है। 18 अक्टूबर के पूर्ण मैदान अभ्यास के बाद 20 अक्टूबर को होने वाले मुख्य आयोजन में रामायण के मंचन से लेकर विशाल पुतलों के दहन तक दर्शकों को लगातार करीब चार घंटे का कार्यक्रम देखने को मिलेगा।