हिंदी दिवस पर बीएचयू में लगी अभिनेता संजय मिश्रा की क्लास, विद्यार्थियों को दिया सफलता का मंत्र, ‘अचिंत्य 6.0’ का विमोचन

हिंदी दिवस के अवसर पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विज्ञान संस्थान स्थित महामना हाल में हिंदी प्रकाशन समिति की ओर से आयोजित समारोह में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के साथ जीवन के अनुभवों की भी चर्चा हुई। खचाखच भरे सभागार में विद्यार्थी, शिक्षक और साहित्य प्रेमी मौजूद रहे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात अभिनेता संजय मिश्रा रहे। इस अवसर पर हिंदी प्रकाशन समिति की पत्रिका ‘अचिंत्य 6.0’ के विशेषांक ‘क्षितिज के परे’ का विमोचन भी किया गया।
 

महामना हाल में सजा हिंदी और साहित्य का मंच, अभिनेता बोले- आगे बढ़िए, लेकिन अपनी जमीन और जड़ों को मत छोड़िए

वाराणसी। हिंदी दिवस के अवसर पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विज्ञान संस्थान स्थित महामना हाल में हिंदी प्रकाशन समिति की ओर से आयोजित समारोह में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के साथ जीवन के अनुभवों की भी चर्चा हुई। खचाखच भरे सभागार में विद्यार्थी, शिक्षक और साहित्य प्रेमी मौजूद रहे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात अभिनेता संजय मिश्रा रहे। इस अवसर पर हिंदी प्रकाशन समिति की पत्रिका ‘अचिंत्य 6.0’ के विशेषांक ‘क्षितिज के परे’ का विमोचन भी किया गया।


कार्यक्रम का संचालन दीपांशी अग्रवाल ने किया। विज्ञान संस्थान के डीन-डायरेक्टर ने मुख्य अतिथि संजय मिश्रा का पुष्पगुच्छ और स्मृति चिह्न देकर स्वागत किया। इसके बाद हिंदी भाषा के महत्व पर वक्ताओं ने विचार रखे।


बनारस को बताया खूबसूरत सोच
मंच पर पहुंचे संजय मिश्रा ने अपने संबोधन में बनारस से जुड़े अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि वह अभिनेता की जिंदगी जीते हैं और उन्हें बनारस बेहद पसंद है। उनके अनुसार, “बनारस एक खूबसूरत सोच है।” उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी पहचान और जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया। बनारस की गलियों में गमछा पहनकर घूमने की अपनी याद साझा करते हुए उन्होंने शहर की सादगी और संस्कृति से अपने लगाव को भी व्यक्त किया।


समोसे से लेकर 18 पेज के आवेदन तक सुनाए किस्से
संजय मिश्रा ने अपने स्कूली दिनों के कई रोचक प्रसंग सुनाकर विद्यार्थियों को खूब हंसाया। उन्होंने बताया कि एक बार वह स्कूल पहुंचने में आधे घंटे देर हो गए थे। रास्ते में समोसा खाने के कारण देर हुई, लेकिन शिक्षक के पूछने पर उन्होंने मां के बीमार होने की बात कह दी। शिक्षक ने आवेदन लिखने को कहा तो उन्होंने 18 पेज का आवेदन लिख डाला। केंद्रीय विद्यालय की यादों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि स्कूल में भारत का नक्शा बनाने में भी उनका योगदान रहा। उनके संस्मरणों ने विद्यार्थियों और मंच के बीच की औपचारिक दूरी को कम कर दिया।


असफलता से सीखने की दी सीख
विद्यार्थियों के सवालों का जवाब देते हुए अभिनेता ने अपने फिल्मी सफर और संघर्ष के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि फिल्म चाणक्य में एक दृश्य के लिए उन्हें 28 टेक देने पड़े थे, जबकि अब वह एक टेक में काम कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि वह पढ़ाई में बहुत अच्छे नहीं रहे, लेकिन इतिहास को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि देखना चाहते थे। उन्होंने विद्यार्थियों से असफलताओं से घबराने के बजाय उनसे सीखने की सलाह दी। कहा कि “असफलता का स्वाद चखो, तब सफलता का मतलब समझ आएगा।” उन्होंने संघर्ष को व्यक्तिगत यात्रा बताते हुए अवसर मिलने पर उसका पूरा लाभ उठाने का संदेश दिया।


अपनी जमीन से जुड़े रहने का संदेश
संजय मिश्रा ने विद्यार्थियों को पढ़ाई को तनाव के रूप में न लेने और अपनी रुचियों को पहचानने की सलाह दी। घाघ कवि का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन अपनी जमीन नहीं छोड़नी चाहिए। मातृभाषा और संस्कृति से जुड़ाव को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी जड़ों को समझने का आह्वान किया। कार्यक्रम में प्रो. एसपी सिंह, प्रो. एसके मिश्र, प्रो. मनोज श्रीवास्तव, प्रो. राघव मिश्र, प्रो. रजनीकांत मिश्र, डॉ. भूपेंद्र कुमार समेत अन्य शिक्षक मौजूद रहे। अंत में डॉ. चंद्रशेखर पति त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए अतिथियों, आयोजकों, विद्यार्थियों और हिंदी प्रकाशन समिति के सहयोगियों के प्रति आभार जताया।