अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: भारतीय महिला खिलाड़ी छह खेलों में बदल रही तस्वीर
नई दिल्ली, 05 मार्च (हि.स.)। इस बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम #GiveToGain है, जो भारतीय खेलों की एक अहम सच्चाई को सामने लाती है। महिला खिलाड़ियों को जब सही निवेश, अवसर और मजबूत सहयोग मिलता है, तो वे न केवल रिकॉर्ड बनाती हैं, बल्कि पूरे खेल परिदृश्य को बदलने की क्षमता भी दिखाती हैं। आज भारतीय महिला खिलाड़ी कई खेलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए वैश्विक मंच पर देश का नाम रोशन कर रही हैं। विश्व खिताब जीतने से लेकर प्रेरणादायक संघर्ष की कहानियां लिखने तक ये खिलाड़ी नई पीढ़ी के लिए मिसाल बन रही हैं।
आइए जानते हैं उन छह खेलों के बारे में जहां भारतीय महिलाएं खेल की दुनिया में नया अध्याय लिख रही हैं।
क्रिकेट: विश्व कप जीत के साथ सुनहरा दौर
भारत में महिला क्रिकेट एक नए और रोमांचक दौर में प्रवेश कर चुका है। बढ़ती लोकप्रियता, मजबूत लीग संरचना और अंतरराष्ट्रीय सफलता ने इस खेल को नई पहचान दी है। इस सफलता के केंद्र में हरमनप्रीत कौर हैं, जिन्होंने भारत को उसके पहले आईसीसी महिला विश्व कप खिताब तक पहुँचाकर इतिहास रच दिया। इस जीत ने पूरे देश में महिला क्रिकेट के प्रति उत्साह और समर्थन को नई ऊँचाइयों पर पहुंचा दिया।
स्टार बल्लेबाज स्मृति मंधाना ने भी अपने शानदार प्रदर्शन से टीम की सफलता में अहम योगदान दिया। उन्होंने भारत के विश्व कप अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु को उनका दूसरा महिला प्रीमियर लीग खिताब दिलाया। इसके साथ ही आरसीबी पुरुष आईपीएल और महिला डब्ल्यूपीएल दोनों खिताब जीतने वाली पहली फ्रेंचाइजी बन गई। जेमिमा रोड्रिग्स ने सेमीफाइनल में निर्णायक प्रदर्शन कर भारत को फाइनल तक पहुंचाया, जबकि शफाली वर्मा ने चोटिल खिलाड़ी की जगह लेकर धमाकेदार प्रदर्शन किया और ‘प्लेयर ऑफ द फाइनल’ चुनी गईं।
हॉकी: अनुभव, नेतृत्व और निरंतरता की ताकत
भारतीय महिला हॉकी टीम मजबूत नेतृत्व और निरंतर प्रदर्शन के दम पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर रही है। फॉरवर्ड नवनीत कौर भारतीय आक्रमण की अहम कड़ी बन चुकी हैं। 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाली नवनीत ने हाल ही में एसजी पाइपर्स को उनके पहले हॉकी इंडिया लीग खिताब तक पहुँचाया और ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ का पुरस्कार जीता। कप्तान और गोलकीपर सविता पूनिया भारतीय टीम की रक्षा पंक्ति की मजबूत दीवार हैं। 300 से अधिक अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाली सविता ने तीन एशियाई खेलों में पदक जीतने में अहम भूमिका निभाई है। खेल में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें हाल ही में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
स्क्वैश: किशोर सितारे की वैश्विक उड़ान
सिर्फ 17 वर्ष की उम्र में अनाहत सिंह विश्व स्क्वैश की सबसे रोमांचक युवा प्रतिभाओं में शामिल हो चुकी हैं। पिछले एक वर्ष में उन्होंने भारत की शीर्ष महिला स्क्वैश खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान बनाई और पीएसए वर्ल्ड टॉप-20 में जगह बनाकर करियर की सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग 18 हासिल की।उनकी शानदार फॉर्म को और मजबूती तब मिली जब उन्होंने अमेरिका में स्क्वैश ऑन फायर ओपन जीतकर अपना पहला पीएसए ब्रॉन्ज-लेवल खिताब अपने नाम किया।
रनिंग: सहनशक्ति और प्रेरणा की असाधारण कहानिया
प्रतिस्पर्धी खेलों से परे, एंड्योरेंस स्पोर्ट्स में भी भारतीय महिलाएँ प्रेरणादायक कहानियाँ लिख रही हैं। कैप्टन अस्मिता हांडा, जो एक कमर्शियल एयरलाइन पायलट हैं, देशभर के धावकों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। टाटा मुंबई मैराथन में नियमित पेसर के रूप में उन्होंने लद्दाख, बेंगलुरु, दिल्ली और कोलकाता में मैराथन पूरी की है और 2025 में माउंट किलिमंजारो पर भी सफलतापूर्वक चढ़ाई की। इसी तरह रोशनी गुहाठाकुरता की कहानी भी बेहद प्रेरणादायक है। जन्म से ‘क्लबफुट’ जैसी समस्या होने के बावजूद उन्होंने दौड़ के जरिए अपने जीवन को नई दिशा दी। 20 किलो से अधिक वजन कम करने के बाद वह तीन बार टाटा मुंबई मैराथन पूरी कर चुकी हैं।
मोटरस्पोर्ट: ट्रैक पर तेज़ी से बदलती तस्वीर
भारत में मोटरस्पोर्ट में भी महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। इंडियन रेसिंग फेस्टिवल ने हर टीम में एक महिला ड्राइवर को अनिवार्य कर इस बदलाव को नई गति दी है। इस बदलाव की प्रतीक फैबिएन वोहलवेंड बनीं, जिन्होंने गोवा स्ट्रीट रेस जीतकर इतिहास रचा और आईआरएल में रेस जीतने वाली दूसरी महिला बनीं। भारत की युवा पीढ़ी भी तेजी से उभर रही है। मुंबई की राशि शाह को स्वीडन में होने वाली रेसिंग वीमेन ग्लोबल कॉम्पिटिशन 2025-26 के लिए चुना गया है। वहीं अवनी वीरमाननेनी भारत की सबसे कम उम्र की फॉर्मूला-4 रेसर बन चुकी हैं। श्रीनगर की 12 वर्षीय अतीक़ा मीर ने भी इतिहास रचते हुए चैंपियंस ऑफ द फ्यूचर एकेडमी जीतकर अंतरराष्ट्रीय कार्टिंग खिताब जीतने वाली पहली भारतीय बनने का गौरव हासिल किया।
जूडो: मणिपुर से उभरती नई शक्ति
जूडो में भारत का भविष्य मणिपुर की दो प्रतिभाशाली खिलाड़ियों—लिन्थोई चनंबम और ताइबंगनबी चानू—के हाथों में दिखाई देता है। लिन्थोई ने विश्व कैडेट जूडो चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा और ऐसा करने वाली पहली भारतीय बनीं। इसके बाद उन्होंने विश्व जूनियर जूडो चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा को और साबित किया। ताइबंगनबी चानू ने इसी प्रतियोगिता की 52 किलोग्राम श्रेणी में रजत पदक जीतकर वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। दोनों खिलाड़ी फिलहाल इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (आईआईएस) में प्रशिक्षण ले रही हैं और आने वाले वर्षों में भारत के लिए बड़े पदक जीतने की उम्मीद जगाती हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनील दुबे