सीमा पार सब्सिडी पर डब्ल्यूटीओ निर्णय को लेकर नियमों में स्पष्टता जरूरी : विशेषज्ञ

 


नई दिल्ली, 19 अप्रैल (हि.स.)। इंडोनेशिया से आयातित स्टेनलेस स्टील उत्पादों पर यूरोपीय संघ द्वारा लगाए गए प्रतिकार शुल्क से जुड़े विवाद में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के पैनल निर्णय के कानूनी और नीतिगत प्रभावों पर विचार के लिए आयोजित पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने कहा कि सीमा पार सब्सिडी के मामलों में मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों में स्पष्टता की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वित्तीय योगदान की सीमित परिभाषा और सार्वजनिक निकाय की स्थिति तय करने की जटिलताओं के कारण ऐसे मामलों में व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आ रही हैं, जिससे भविष्य के व्यापार विवादों पर भी असर पड़ सकता है।

ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ केंद्र, भारतीय विदेश व्यापार संस्थान ने साउथ एशियन इंटरनेशनल इकोनॉमिक लॉ नेटवर्क और इंडियन सोसायटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ के सहयोग से रविवार को यहां इंडियन सोसायटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ में इस पैनल चर्चा का आयोजन किया। कार्यक्रम में इंडियन सोसायटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार सिन्हा, ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ केंद्र के प्रमुख डॉ. जेम्स जे. नेडुम्पारा, प्रबंध साझेदार शरद भंसाली, अतिथि प्रोफेसर मुकेश भटनागर, पार्थसारथी झा, शोध फेलो आशुतोष कश्यप तथा डॉ. उत्कर्ष के. मिश्रा सहित कई विशेषज्ञ शामिल हुए।

इंडियन सोसायटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार सिन्हा ने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि वैश्विक आर्थिक सहयोग और बदलती औद्योगिक नीतियों के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमन लगातार जटिल होता जा रहा है।

पैनल चर्चा की अध्यक्षता करते हुए ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ केंद्र के प्रमुख डॉ. जेम्स जे नेडुम्पारा ने कहा कि सब्सिडी और प्रतिकार उपाय समझौते के तहत “वित्तीय योगदान” की परिभाषा सीमित है, जिससे सीमा पार सब्सिडी के मामलों में व्याख्या से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

प्रबंध साझेदार शरद भंसाली ने कहा कि विदेशी संस्थाओं, विशेषकर राज्य से जुड़े निकायों द्वारा दी गई वित्तीय सहायता को संबंधित सरकार से जोड़कर देखना कई कानूनी प्रश्न खड़े करता है।

प्रोफेसर मुकेश भटनागर ने कहा कि सार्वजनिक निकाय की स्थिति निर्धारित करने के लिए संबंधित संस्था की प्रकृति और सरकार से उसके संबंधों का गहन मूल्यांकन आवश्यक है।

पार्थसारथी झा ने कहा कि सीमा पार सब्सिडी के मामलों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून और औद्योगिक नीतियों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।

शोध फेलो आशुतोष कश्यप ने कहा कि सीमा पार सरकारी सहायता के बढ़ते स्वरूप से विश्व व्यापार संगठन के मौजूदा ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है।

डॉ. उत्कर्ष के. मिश्रा ने समापन टिप्पणी करते हुए कहा कि इस निर्णय के प्रभाव भविष्य के व्यापार विवादों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों के साथ संवादात्मक सत्र भी आयोजित किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर