मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में छोड़े गए चार और ‘जंगली भैंस‘, संख्या बढ़कर आठ हुई

 


- ‘जंगली भैंस’ पुनर्स्थापना कार्यक्रम के द्वितीय चरण का हुआ सफल संचालन, काजीरंगा से सुपखार लाए गए चार और ‘जंगली भैंस’

भोपाल, 09 मई (हि.स.)। करीब एक सदी बाद मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में ‘जंगली भैंस’ की वापसी से वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में नया अध्याय जुड़ गया है। काजीरंगा से लाए गए चार और ‘जंगली भैंसों‘ को सुपखार क्षेत्र में छोड़े जाने के बाद अब कान्हा में इनकी संख्या बढ़कर आठ हो गई है।

जनसंपर्क अधिकारी के.के. जोशी ने शनिवार को बताया कि कान्हा टाइगर रिजर्व, मंडला के सुपखार परिक्षेत्र में शुक्रवार को प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) समिता राजोरा एवं अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एल. कृष्णमूर्ति ने 4 और जंगली भैंसों को विशेष रूप से निर्मित बाड़े में सफलतापूर्वक मुक्त किया। इस अवसर पर संचालक कान्हा टाइगर रिजर्व रविंद्र मणि त्रिपाठी, उप संचालक (कोर) प्रकाश वर्मा, उप संचालक (बफर) अमिथा के.बी., समस्त सहायक संचालक, परिक्षेत्र अधिकारी एवं स्थानीय वन अमला उपस्थित रहा।

दरअसल, प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मार्गदर्शन में वन विभाग जैव विविधता संरक्षण और विलुप्तप्राय प्रजातियों के पुनर्वास के लिये विशेष अभियान चला रहा है। इसी के अंतर्गत असम के प्रसिद्ध काजीरंगा टाइगर रिजर्व से ‘जंगली भैंस’ को कान्हा के सुपखार क्षेत्र में पुनर्स्थापित किया जा रहा है। सुपखार वह क्षेत्र है, जहां ऐतिहासिक रूप से जंगली भैंसों की उपस्थिति होने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

परियोजना के प्रथम चरण में 28 अप्रैल 2026 को 4 ‘जंगली भैंस’ (1 नर और 3 मादा) को मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सुपखार स्थित विशेष बाड़े में मुक्त किया था। दूसरे चरण में चार और जंगली भैंसों के आगमन के साथ कान्हा में इनकी संख्या बढ़कर आठ हो गई है। आगामी चरणों में भी परियोजना को और विस्तार दिया जाएगा। इससे प्रदेश में जंगली भैंसों की स्थायी और स्वस्थ आबादी विकसित होगी।

उन्होंने बताया कि काजीरंगा टाइगर रिजर्व से कान्हा टाइगर रिजर्व तक लगभग 2,220 किलोमीटर की लंबी दूरी विशेष वन्यजीव परिवहन वाहनों से तय की गई। यात्रा के दौरान दो विशेषज्ञ वन्यजीव चिकित्सकों की टीम लगातार स्वास्थ्य परीक्षण और निगरानी करती रही। सहायक संचालक एवं परिक्षेत्र अधिकारी ने पूरे अभियान का नेतृत्व किया। यह अभियान लगभग 72 घंटे तक चला।

गौरतलब है कि ‘जंगली भैंस’ भारतीय वन्यजीव धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है, साथ ही यह वन पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में भी अहम भूमिका निभाता है। ‘जंगली भैंस’ की वापसी से कान्हा क्षेत्र की जैव विविधता और अधिक समृद्ध होगी और परियोजना देश में वन्यजीव पुनर्स्थापना के सफल मॉडल के रूप में स्थापित हो सकेगी। मध्य प्रदेश, बाघ, चीता और गिद्ध संरक्षण जैसे अभियानों के लिए पहचान बना चुका है। ‘जंगली भैंस’ पुनर्स्थापना अभियान से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि की ओर अग्रसर है।

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हिन्दुस्थान समाचार / उम्मेद सिंह रावत