तृणमूल कांग्रेस की टूट पर बोले अधीर रंजन चौधरी - खेल वही है, सिर्फ अंपायर बदल गया है
कोलकाता, 03 जून (हि.स.)। एक दौर में कांग्रेस को तोड़कर तृणमूल का गठन करने वाली पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी में मची टूट पर पूर्व कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने तीखा तंज कसा है। उन्होंने कहा है कि अब वही खेल हो रहा है। इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है।
उन्होंने कहा कि जिस दल-बदल और राजनीतिक खेल की शुरुआत कभी ममता बनर्जी ने की थी, आज वही खेल उनके खिलाफ खेला जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब अंपायर और रेफरी बदल गए हैं।
बहरमपुर में बुधवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में अधीर रंजन चौधरी ने तृणमूल में जारी टूट को लेकर कहा कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2016 में विधानसभा के भीतर कांग्रेस को विपक्ष की भूमिका निभाने से रोकने का प्रयास किया गया था और उस समय ममता बनर्जी स्वयं इस राजनीतिक खेल की निर्णायक थीं।
पूर्व सांसद ने कहा कि जिस दल-बदल के खेल की शुरुआत एक दिन आपने की थी और कहा था कि खेला होगा, उसी खेल में उस समय आप अंपायर और रेफरी थीं। आज भी वही खिलाड़ी मैदान में हैं, केवल अंपायर और रेफरी बदल गए हैं।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब तृणमूल से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को 58 विधायकों के समर्थन के आधार पर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता की मान्यता मिल चुकी है। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु द्वारा मान्यता दिए जाने के बाद विपक्ष के नेता का कक्ष भी ऋतब्रत को सौंप दिया गया है।
तृणमूल के बागी विधायकों और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच संभावित राजनीतिक समीकरणों पर भी अधीर रंजन चौधरी ने टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भाजपा और बागी विधायक दोनों ही फिलहाल एक-दूसरे से प्रत्यक्ष दूरी बनाए हुए हैं। अधीर ने कोविड काल के लोकप्रिय नारे का उल्लेख करते हुए कहा कि दो गज की दूरी बहुत जरूरी है। उनके अनुसार भाजपा जानती है कि यदि इन विधायकों को सीधे पार्टी में शामिल किया गया तो राजनीतिक नुकसान हो सकता है, जबकि बागी विधायक भी अपने मतदाताओं की प्रतिक्रिया को लेकर सतर्क हैं।
उन्होंने दावा किया कि तृणमूल के कई विधायक मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से निर्वाचित होकर आए हैं और सीधे भाजपा में शामिल होने पर उन्हें जनाक्रोश का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, वे अंततः भाजपा के राजनीतिक प्रभाव में काम करने को मजबूर हो सकते हैं।
अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के केवल एक महीने के भीतर तृणमूल कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह बिखरती दिखाई दे रही है। उन्होंने दावा किया कि राज्य के विभिन्न हिस्सों में पार्टी से जुड़े जनप्रतिनिधियों के इस्तीफों का सिलसिला शुरू हो गया है और कई स्थानीय निकायों में भी तृणमूल की पकड़ कमजोर पड़ रही है।
कांग्रेस नेता ने तृणमूल कांग्रेस के गठन के इतिहास का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी स्वयं कांग्रेस छोड़कर बाहर आई थीं और वर्ष 1998 में तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उनके अनुसार उस समय कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद पैदा हुए थे, जिसके बाद ममता ने अलग राजनीतिक राह चुनी थी।
अधीर रंजन चाैधरी ने कहा कि 2011 में वाम मोर्चा सरकार के 34 वर्षों के शासन का अंत कर सत्ता में आई तृणमूल कांग्रेस ने लगातार तीन चुनाव जीते, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद अब पार्टी गंभीर आंतरिक संकट से गुजर रही है। उनके मुताबिक, वर्तमान घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत दे रहा है। ------------------
हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर