उप्र के वाराणसी में शुक्रवार से तीन दिवसीय ‘सम्राट विक्रमादित्य’ महानाट्य, मंचन की तैयारी पूर्ण

 




- वाराणसी के नागरिकों में आयोजन को लेकर अपार उत्साहभोपाल, 02 अप्रैल (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ का मंचन मध्य प्रदेश सरकार द्वारा विक्रमोत्सव-2026 के अंतर्गत 3 से 5 अप्रैल 2026 तक बी.एल.डब्ल्यू. मैदान में होने जा रहा है।

जनसंपर्क अधिकारी अनुराग उइके ने बताया कि शुक्रवार से आयोजित तीन दिवसीय महानाट्य मंचन को लेकर वाराणसी के नागरिकों में अपार उत्साह है। गुरुवार को जब रिहर्सल की जा रही थी तब भी बड़ी संख्या में नागरिक इसे देखने पहुंचे। इस मंचन को लेकर सभी तैयारियां पूर्ण हो गई है। यह ऐतिहासिक मंचन सांस्कृतिक साहित्यिक दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण कीर्ति यज्ञ है। यह केवल एक नाटकीय प्रस्तुति नहीं, अपितु भारतीय इतिहास की गौरवशाली परंपरा को पुनः सजीव करने का एक सशक्त प्रयास है, जिसमें शौर्य, न्याय, सुशासन और सांस्कृतिक वैभव की अमर गाथा मंच पर सजीव होती है।

उल्लेखनीय है कि सम्राट विक्रमादित्य प्राचीन भारतीय परंपरा के महानायक हैं। उज्जैन के प्रतापी राजा, जिन्होंने शकों का संहार कर ‘शकारि’ की उपाधि धारण की और विक्रम संवत् की स्थापना की। लोक कथाओं, बेताल-पच्चीसी, सिंहासन-बत्तीसी तथा अनेक पुराणिक ग्रंथों में उनका चरित्र न्यायप्रियता, वीरता, प्रजा-हितैषी और ज्ञान-विज्ञान के संरक्षण का प्रतीक बनकर उभरा है। यह महानाट्य उसी चरित्र को मंच पर जीवंत करता है, जहाँ शताधिक कलाकारों के माध्यम से रथ, अश्व, पालकी तथा ऊंटों के वास्तविक प्रयोग के साथ अत्याधुनिक ग्राफिक्स और संगीत-नृत्य का समन्वय दर्शकों को प्राचीन कालखंड में ले जाता है।

इस नाटक का साहित्यिक सांस्कृतिक महत्त्व बहुआयामी है। यह ऐतिहासिक स्मृति को पुनर्जीवित करता है। ऐसे युग का चित्रण, जब भारत ‘अखंड’ था, सुशासन का आदर्श स्थापित था और ज्ञान-विज्ञान की परंपरा चरमोत्कर्ष पर थी। सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य सांस्कृतिक एकता का संदेश देता है।

काशी (वाराणसी) जैसी धर्म नगरी में मध्यप्रदेश के कलाकारों द्वारा इस गाथा का मंचन उत्तर और मध्य भारत की सांस्कृतिक सेतु का प्रतीक है। साहित्यिक भाषा में यह ‘महानाट्य’ शैली का उदाहरण है, जो न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि नैतिक-आध्यात्मिक जागरण भी करता है।

विक्रमादित्य का चरित्र आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक है। न्याय की स्थापना, प्रजा को आर्थिक सशक्तिकरण तथा शत्रुओं पर विजय के माध्यम से एक आदर्श राज्य-व्यवस्था का दर्शन है। इसके अतिरिक्त, इस आयोजन के साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’ का बाबा विश्वनाथ को अर्पण भारतीय समय-गणना की प्राचीन परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोड़ने का सुंदर प्रतीक है।

यह महानाट्य मात्र दृश्य-श्रव्य कला नहीं, अपितु हमारी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में एक साहित्यिक-सांस्कृतिक अभियान है, जो युवा पीढ़ी में स्वाभिमान, विरासत-बोध और राष्ट्र-गौरव का बीज बोता है। वाराणसी में यह मंचन साहित्यिक दृष्टि से एक ‘युग-पुरुष’ की कथा को समकालीन मंच पर स्थापित करने का प्रयास है, जो भारतीय साहित्य और संस्कृति की अनंत धारा को निरंतर प्रवाहित रखने में सहायक होगा। यह न केवल विक्रमादित्य की अमर गाथा को गूँजाएगा, बल्कि काशी की पावन भूमि पर भारतीयता के गौरव को नूतन आयाम प्रदान करेगा।

हिन्दुस्थान समाचार / उम्मेद सिंह रावत