श्री काशी विश्वनाथ धाम के मंदिर चौक पर स्थापित हुई विक्रमादित्य वैदिक घड़ी, श्रद्धालुओं का बनी आकर्षण
—मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वैदिक घड़ी भेंट की
वाराणसी, 05 अप्रैल (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी स्थित श्री काशी विश्वनाथ धाम के मंदिर चौक पर विक्रमादित्य वैदिक घड़ी विधिवत स्थापित कर दी गई है। आकर्षण का नया केंद्र बनी यह लगभग दस फीट ऊंची और आयताकार घड़ी सनातन परंपराओं और हिंदू नववर्ष आधारित वैदिक कालगणना पद्धति पर आधारित है, जिसे श्रद्धालु पसंद करने के साथ सराह भी रहे हैं।
इस विशिष्ट घड़ी को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेंट किया था। 3 अप्रैल 2026 को वाराणसी में आयोजित ‘सम्राट विक्रमादित्य’ महानाट्य के मंचन से पूर्व यह भेंट दी गई, जिसके बाद अब इसे धाम परिसर में स्थापित कर दिया गया है।
रविवार को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) डॉ. विश्वभूषण मिश्र ने बताया कि यह विशिष्ट घड़ी सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक समय की गणना करती है, जिसमें कुल 30 मुहूर्त होते हैं। घड़ी न केवल सामान्य समय, बल्कि पंचांग, शुभ मुहूर्त, ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति, तापमान, आर्द्रता और हवा की गति जैसी जानकारियां भी प्रदर्शित करती है। साथ ही, यह भारतीय मानक समय (आईएसटी) और ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी) के साथ वैदिक समय भी दर्शाती है। इस घड़ी से जुड़ा एक मोबाइल ऐप भी विकसित किया गया है, जो 189 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध है और इसमें सात हजार वर्षों से अधिक के पंचांग का डेटा संकलित है। उन्हाेंने बताया कि इस परियोजना का उद्देश्य प्राचीन भारतीय कालगणना पद्धति, जिसे महाराजा विक्रमादित्य के समय से जोड़ा जाता है, को पुनर्स्थापित करना है। इसका विकास उज्जैन स्थित महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ ने किया है।
गौरतलब है कि विश्व की पहली विक्रमादित्य वैदिक घड़ी उज्जैन में स्थापित की गई थी। इसके बाद इसे भोपाल स्थित मुख्यमंत्री निवास में लगाया गया और अब काशी में इसकी स्थापना की गई है। मध्य प्रदेश सरकार योजना के तहत भविष्य में देश के अन्य ज्योतिर्लिंगों में भी ऐसी घड़ियां स्थापित करने की तैयारी में है। घड़ी की एक और विशेषता इसका आकर्षक डिजिटल बैकग्राउंड है, जिसमें हर घंटे देश-दुनिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों की तस्वीरें बदलती रहती हैं। धार्मिक आस्था और आधुनिक तकनीक के इस अनूठे संगम को भारतीय संस्कृति, खगोल विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी