संसद परिसर में सनातन के अपमान पर भड़का संत समाज, संत समाज से सार्वजनिक रूप से माफी मांगें पप्पू यादव

 






- संसद, संविधान व सनातन का सम्मान ही भारत की पहचान

- संसद विवाद पर संत एकजुट, धार्मिक हस्तियों ने जताई नाराजगी

लखनऊ, 01 अगस्त (हि.स.)। संसद भवन परिसर में सांसद पप्पू यादव द्वारा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चित्र के कथित अपमान, साधु-संतों के प्रति अमर्यादित व्यवहार और सनातन धर्म पर की गई टिप्पणी को लेकर देशभर के संत समाज, धर्माचार्यों और कई प्रमुख हस्तियों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। संतों ने कहा कि संसद केवल राजनीतिक विमर्श का मंच नहीं बल्कि लोकतंत्र और संविधान की गरिमा का प्रतीक है। ऐसे पवित्र संस्थान में आस्था के प्रतीकों का उपहास भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की भावना के विपरीत है।

संतों का कहना है कि संविधान सभी नागरिकों को अपने धर्म और आस्था के पालन की स्वतंत्रता देता है। इसलिए किसी भी धर्म, संत परंपरा या आराध्य के प्रति अपमानजनक व्यवहार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं आता। संतों ने कहा कि सनातन परंपरा हजारों वर्षों से सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता, सेवा और वसुधैव कुटुंबकम् का संदेश देती आई है। भगवान श्रीराम मर्यादा, न्याय और लोककल्याण के आदर्श हैं और उनके चित्र के साथ अमर्यादित व्यवहार करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत करने वाला कृत्य है।

भारत के सांस्कृतिक प्रतीकों का अपमान स्वीकार्य नहीं : मिथिलेशनंदिनीशरण

आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने संसद परिसर में धार्मिक पहचान का उपहास किए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि भगवा भारत की सांस्कृतिक आत्मा और सनातन परंपरा का प्रतीक है। उन्होंने इसे राजनीतिक हताशा का प्रदर्शन बताते हुए कहा कि भारत के सांस्कृतिक प्रतीकों का अपमान किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता। आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने कहा कि यह एक मनोवृत्ति है, अनेक कारक तत्त्व इसमें अन्तर्निहित हैं। जिनके राजनैतिक वंशधर अपना चढ़ावा लुटवाने का यह नाटक कर रहे हैं, वे प्रियदर्शिनी इसी भगवा रंग के सम्मुख दण्डवत् करती हुई देखी जाती थीं। यह वेष को अपमानित करने की पुरानी राजनीति संसद के वक्तव्यों से लेकर परिसर के इस पाखण्ड तक एक ही कड़ी में है। सनातन भारत के अपमान का यह पाप इन्हें सत्ता से, दल और दल से निर्दल तक तो पहुंचा ही चुका है। किन्तु पतन की इस यात्रा के और प्रसंग अभी शेष हैं।

संत समाज की छवि धूमिल करने का प्रयास

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एवं हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत डॉ. रविंद्रपुरी महाराज ने सवाल उठाया कि यदि किसी साधु, संत या पुजारी पर चढ़ावा चोरी का आरोप है तो उसका नाम, एफआईआर और एसआईटी रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि बिना किसी संत का नाम सामने आए साधु का वेश धारण कर प्रदर्शन करना पूरे संत समाज की छवि को धूमिल करने वाला कदम है, जिससे करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।

धार्मिक प्रतीकों का उपहास संस्कृति और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं : अवधेशानंद गिरि

जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर एवं हिंदू धर्म आचार्य सभा के अध्यक्ष स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि भारत की पहचान मर्यादा, शालीनता और संवाद की संस्कृति से है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है लेकिन विरोध के नाम पर अशिष्ट भाषा, व्यक्तिगत अपमान और धार्मिक प्रतीकों का उपहास भारतीय संस्कृति और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं है। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में संयमित भाषा और संवैधानिक पदों के सम्मान को आवश्यक बताया। अयोध्या के साकेत भवन के पीठाधीश्वर महंत सीताराम दास महाराज ने भगवा और सनातन धर्म के अपमान का आरोप लगाते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का जवाब आने वाले समय में जनता स्वयं देगी।

किसी के बहकावे में आकर ऐसी गतिविधियों का हिस्सा न बनें युवा : मुकेश खन्ना

अभिनेता मुकेश खन्ना ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में शामिल लोग वास्तविक छात्र नहीं थे बल्कि उन्हें राजनीतिक उद्देश्य से आगे किया गया। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे किसी के बहकावे में आकर ऐसी गतिविधियों का हिस्सा न बनें क्योंकि ऐसे बयान और घटनाएं भविष्य में उनके करियर और प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकती हैं।

घटना की निष्पक्ष जांच की मांग

हिंदू सुरक्षा सेवा ट्रस्ट एवं हिंदू सुरक्षा सेवा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत राजू दास ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति पर किसी प्रकार की अनियमितता का आरोप है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए लेकिन उसके आधार पर पूरे संत समाज और सनातन परंपरा का अपमान करना उचित नहीं है। उन्होंने घटना की निष्पक्ष जांच कराने और सार्वजनिक जीवन में मर्यादा बनाए रखने की मांग की।

लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से होना चाहिए विरोध

संत समाज ने लोगों से शांति और संयम बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि विरोध लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से होना चाहिए। धर्माचार्यों ने कहा कि संसद की गरिमा, संविधान की भावना और सनातन परंपरा का सम्मान भारत की सांस्कृतिक आत्मा के तीन मजबूत आधार हैं। उन्होंने नई पीढ़ी में संस्कार, राष्ट्रभक्ति और आध्यात्मिक चेतना विकसित करने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

पप्पू यादव संत समाज से सार्वजनिक रूप से मांगें माफी : स्वामी बलरामाचार्य

स्वामी बलरामाचार्य ने कहा कि संसद परिसर में भगवा वस्त्र धारण कर किया गया प्रदर्शन अत्यंत निंदनीय है। इससे संत समाज और सनातन परंपरा की भावनाएं आहत हुई हैं। भगवा ज्ञान, तप, त्याग और संन्यास का प्रतीक है इसलिए उसका सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सांसद पप्पू यादव संत समाज से सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना करें। लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना सभी जनप्रतिनिधियों का दायित्व है। साथ ही पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने की भी मांग की।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ .राजेश