दुनिया भर की भाषाओं का तीर्थ है काशी, हर भाषा के विद्वानों का संगम बनारस : पदुम नारायण द्विवेदी

 


भारतीय भाषा समागम में राज्य सूचना आयुक्त बोले- भाषाओं के विद्वानों, साहित्यकारों और पत्रकारों को तलाशें तो बड़ी संख्या में काशी में ही मिलते हैं

वाराणसी, 13 सितम्बर (हि.स.)। काशी सिर्फ आस्था और अध्यात्म का तीर्थ नहीं, बल्कि भाषाओं और ज्ञान की ऐसी भूमि है, जहां भारत ही नहीं, दुनिया की भाषाई विरासत से जुड़ने की संभावनाएं दिखाई देती हैं। अलग-अलग भाषाओं के विद्वानों, साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों का जिस व्यापक स्तर पर संगम काशी में दिखाई देता है, वह इसे भाषाओं के तीर्थ के रूप में विशिष्ट पहचान देता है। यह बात रविवार को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में 'हिन्दुस्थान समाचार' की ओर से आयोजित भारतीय भाषा समागम-2026 में बतौर विशिष्ट अतिथि राज्य सूचना आयुक्त पदुम नारायण द्विवेदी ने कही।

उन्होंने कहा कि दुनिया में शायद ही कोई ऐसा नगर होगा, जहां इतनी भाषाओं के विद्वान एक साथ मिलते हों। भारतीय भाषाओं के विद्वानों, कलाकारों और पत्रकारों को खोजने के दौरान अनुभव हुआ कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग काशी में ही मिल जाते हैं। अलग-अलग भाषाओं की अपनी समृद्ध परंपराएं हैं, लेकिन काशी उन सभी को एक साझा सांस्कृतिक और ज्ञान की भूमि प्रदान करती है। यही बनारस की सबसे बड़ी विशिष्टता है।

भाषाओं को जोड़ने वाली काशी की परंपरा

पदुम नारायण द्विवेदी ने कहा कि 'हिन्दुस्थान समाचार' की ओर से हिंदी दिवस के आसपास काशी में भारतीय भाषा समागम का आयोजन पिछले करीब 15 वर्षों से किया जा रहा है। इस आयोजन का उद्देश्य केवल भाषाओं पर चर्चा करना नहीं, बल्कि विभिन्न भारतीय भाषाओं की विद्वत परंपराओं, साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों को एक मंच पर लाना भी है।

उन्होंने कहा कि 'हिन्दुस्थान समाचार' की ओर से पूर्व में भी ऐसे आयोजन किए जाते रहे हैं। इस दौरान यह अनुभव हुआ कि भारतीय भाषाओं से जुड़े अनेक विद्वान और रचनाकार काशी में ही मिल जाते हैं। यह बताता है कि बनारस की मिट्टी में भाषाओं को जोड़ने और संवाद की परंपरा कितनी गहरी है।

ज्ञान की धाराओं का भी संगम है काशी

राज्य सूचना आयुक्त ने कहा कि काशी का महत्व केवल भाषाओं तक सीमित नहीं है। भारतीय ज्ञान परंपरा की भी इसकी जड़ें बेहद गहरी हैं। यह प्राचीन नगरी सदियों से चिंतन, संवाद और ज्ञान-मंथन का केंद्र रही है। प्रयागराज, नैमिषारण्य और अन्य प्राचीन ज्ञान केंद्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की धरती भारतीय ज्ञान और चिंतन की ऐसी विरासत को समेटे हुए है, जिसका विस्तार बहुत व्यापक है।

उन्होंने कहा कि भाषा किसी समाज की केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि उसकी स्मृति, संस्कृति, साहित्य और ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे ले जाने वाली शक्ति है। इसलिए भाषाओं के विद्वानों को एक मंच पर लाना भारतीय ज्ञान परंपरा की विभिन्न धाराओं को जोड़ने जैसा है।

भाषाओं के इस तीर्थ की परंपरा आगे बढ़े

पदुम नारायण द्विवेदी ने बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना करते हुए कहा कि 'हिन्दुस्थान समाचार' की ओर से आयोजित भारतीय भाषा समागम की परंपरा हर वर्ष और व्यापक होती रहे। भारतीय भाषाओं के विद्वानों, साहित्यकारों और पत्रकारों को एक मंच पर लाने का यह प्रयास निरंतर मजबूत हो। काशी में भाषाओं का यह संगम देश की विविध भाषाई परंपराओं के बीच संवाद और आत्मीयता की धारा को आगे बढ़ाता रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी