पतंजलि विश्वविद्यालय में 52वां अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन संपन्न
-स्वामी रामदेव ने भारतीय पंचांग और विक्रम संवत को राष्ट्रीय जीवन में अपनाने पर दिया जोर
हरिद्वार, 31 अक्टूबर (हि.स.)। पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय 52वां अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन शनिवार को संपन्न हो गया। पतंजलि विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय और भारतीय विद्वत परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत, योग, आयुर्वेद, दर्शन और सनातन संस्कृति के संरक्षण पर व्यापक विमर्श हुआ।
समापन समारोह में कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा सहित देशभर के संत, धर्माचार्य और शिक्षाविद मौजूद रहे। सम्मेलन में 24 विद्वानों को सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र पुरस्कार, 35 पुस्तकों का विमोचन और 92 पुस्तक एवं प्रदर्शनी स्टॉल आकर्षण का केंद्र रहे।
सम्मेलन अध्यक्ष श्रीनिवास वरखेड़ी ने स्वामी रामदेव को विद्याधिपति-प्रशस्ति-पत्रम भेंट किया। संस्कृत, योग और आयुर्वेद में योगदान के लिए आचार्य बालकृष्ण को महामहोपाध्याय, प्रति कुलपति डॉ. देवप्रिया को महाआचार्या और डॉ. शिवानी वी. को व्याकरण पंडिता सम्मान से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर प्रो. अरुण रंजन मिश्रा को अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया।
विक्रम संवत को राष्ट्रीय जीवन में अपनाने पर जोर
स्वामी रामदेव ने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियां नहीं, बल्कि गुण और कर्म के प्रतीक हैं। उन्होंने भारतीय पंचांग और विक्रम संवत को राष्ट्रीय जीवन में व्यापक रूप से अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति केवल आस्था नहीं, बल्कि अहिंसा, सत्य, सद्भाव और मानव कल्याण का दर्शन है। वर्तमान विदेशी शिक्षा पद्धति से रोग, वैचारिक विकार और सांस्कृतिक विद्रूपता बढ़ रही है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना का विकास होना चाहिए।
सनातन शास्त्र शुद्धि समिति का गठन
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि पतंजलि में सनातन को लेकर इतिहास रचा गया। सम्मेलन में देश के अलग-अलग मत-पंथ के संतों को एक मंच पर लाकर सनातन शास्त्र शुद्धि समिति का गठन किया गया। यह पहली बार हुआ कि विद्वान सुबह 9 बजे से रात तक करीब 13 घंटे लगातार बैठे रहे।
भारतीय शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष एनपी सिंह ने कहा कि सनातन दर्शन में समग्र मानव कल्याण और प्रकृति संरक्षण का संदेश निहित है। भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान में समन्वय जरूरी है।
शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप ने गुरुकुल शिक्षा को राष्ट्रव्यापी स्तर पर अपनाने पर जोर दिया और 8 से 11 वर्ष के बच्चों के लिए गुरुकुल शिक्षा अनिवार्य करने का सुझाव दिया।
कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा ने कहा कि पतंजलि में बच्चों को मिल रहे संस्कार किसी स्वप्न के साकार होने जैसे हैं। देश के अन्य संस्थानों को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।
सम्मेलन की उपलब्धियां :
सम्मेलन में 26 राज्यों से 1800 प्रतिभागी शामिल हुए, जिनमें 552 शिक्षक, 467 शोधार्थी, 403 विद्यार्थी थे। 32 कुलपति, 40 संत और 90 विद्वान पहुंचे। पांच नए शोध विषय वर्ग- कुंभ रहस्यम्, भारतीय ज्ञान प्रणाली, भारतीय अनुसंधान पद्धति, बाल साहित्य और प्राच्यविद्या का पुनरावलोकन जोड़े गए। तीन नई पुरस्कार श्रेणियां शुरू की गईं। कुलपति सम्मेलन में उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान प्रणाली को जोड़ने पर मंथन हुआ।
तीन दिनों में 100 से अधिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने समां बांधा। प्रति कुलपति साध्वी देवप्रिया ने सम्मेलन की आख्या प्रस्तुत की।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला