विभाजन की विभीषिका पर सुधांशु त्रिवेदी ने सुनाया जोगेंद्र नाथ मंडल का प्रसंग
नई दिल्ली, 14 अगस्त (हि.स.)। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में विभाजन से जुड़े इतिहास के एक महत्वपूर्ण प्रसंग का उल्लेख करते हुए जोगेंद्र नाथ मंडल के राजनीतिक सफर और उनके अनुभवों को सामने रखा। त्रिवेदी ने सिलहट के जनमत संग्रह से लेकर पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री के रूप में मंडल की भूमिका और 1950 में उनके इस्तीफे तक की घटनाओं का जिक्र किया।
डॉ. त्रिवेदी ने इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय में 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' पर शुक्रवार को आयोजित कार्यक्रम में कहा कि 1947 में तत्कालीन असम के सिलहट क्षेत्र में जनमत संग्रह कराया गया था, जिसमें यह तय होना था कि क्षेत्र भारत में रहे या पाकिस्तान में शामिल हो, सिलहट का अधिकांश हिस्सा जनमत संग्रह के बाद पाकिस्तान में चला गया और बाद में यह क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान तथा वर्तमान बांग्लादेश का हिस्सा बना।
उन्होंने इस संदर्भ में जोगेंद्र नाथ मंडल का उल्लेख करते हुए कहा कि वह अनुसूचित जाति के प्रमुख नेता थे और उन्होंने मुस्लिम लीग के साथ राजनीतिक सहयोग किया था। पाकिस्तान बनने के बाद मंडल को वहां की पहली सरकार में कानून मंत्री बनाया गया। वह पाकिस्तान के शुरुआती सत्ता ढांचे में शामिल उन प्रमुख गैर-मुस्लिम नेताओं में थे, जिनसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की उम्मीद की गई थी। हालांकि कुछ ही वर्षों में मंडल का पाकिस्तान की व्यवस्था से मोहभंग हो गया और 8 अक्टूबर 1950 को उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा सौंप दिया।
इस्तीफे में उन्होंने पूर्वी बंगाल में हिंदू और अनुसूचित जाति के लोगों के साथ भेदभाव तथा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए। ऐतिहासिक स्रोतों में भी उनके इस्तीफे को पाकिस्तान की तत्कालीन प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था से उनके असंतोष से जोड़ा गया है।
डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि मंडल का इस्तीफा केवल एक मंत्री के पद छोड़ने की घटना नहीं थी, बल्कि उस राजनीतिक भरोसे के टूटने का प्रतीक थी जिसके साथ उन्होंने पाकिस्तान की नई व्यवस्था में प्रवेश किया था। उन्होंने मंडल के प्रसंग के जरिए यह रेखांकित किया कि विभाजन का असर केवल सीमाओं के बदलने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने लाखों लोगों की राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जिंदगी को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।
मंडल के इस्तीफे के बाद उनका भारत लौटना भी विभाजन की त्रासदी के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखा जाता है। बाद के वर्षों में उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के पुनर्वास के प्रयासों में भूमिका निभाई। -----------
हिन्दुस्थान समाचार / सौरव राय