अब 20 किमी. की ऊंचाई से होगी दुश्मन की निगरानी, कामयाब रहा हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म का ट्रायल

 


- एचएपीएस ने 21 किमी. की ऊंचाई हासिल की और 30 मिनट से ज्यादा समय तक आसमान में रहा

नई दिल्ली, 06 अक्टूबर (हि.स.)। भारत को 20-25 किमी. की ऊंचाई से जमीन पर नजर रखने वाली हथियार प्रणाली विकसित करने में कामयाबी मिली है।डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) ने स्वदेशी हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म (एचएपीएस) का सफल ट्रायल किया है। एचएपीएस ने मध्यम स्तर से 21 किमी. की ऊंचाई हासिल की और 30 मिनट से ज्यादा समय तक आसमान में रहा। इसके बाद इसे वापस जमीन पर उतरने का आदेश दिया गया। सिस्टम को सफलतापूर्वक रिकवर करने के बाद फ्लाइट परफॉर्मेंस डेटा का विश्लेषण किया गया।

डीआरडीओ के मुताबिक पूरी फ्लाइट के दौरान ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन पर एयरबोर्न प्लेटफॉर्म से रियल-टाइम वीडियो डेटा और बाकी सभी पैरामीटर लिए गए, जिससे तय फ्लाइट परफॉर्मेंस का पता चला। सिस्टम में कई इंस्ट्रूमेंटेशन और कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक पैकेज थे जैसे इनर्शियल मेजरमेंट यूनिट, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम रिसीवर, ऑनबोर्ड कैमरे, एल्टीट्यूड कंट्रोल मैकेनिज्म के अलावा कई दूसरे सब-सिस्टम भी थे। यह ट्रायल भारतीय वायुसेना, डीजीसीए, एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया और दूसरी सिविल अथॉरिटी जैसी कई एजेंसियों के साथ कोआर्डिनेशन में किया गया था।

हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म हवा से हल्का सिस्टम है और लंबे समय तक चलने वाला समताप मंडल हवाई निगरानी मंच है, इसे आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट डिजाइन और विकसित कर रहा है। यह सौर ऊर्जा से चलने वाला मानव रहित विमान (यूएवी) या एयरशिप है, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 17 से 25 किलोमीटर की ऊंचाई पर समताप मंडल में उड़ान भरता है। इसे 'हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट' भी कहा जाता है। यह पारंपरिक उपग्रहों और कम ऊंचाई वाले ड्रोनों के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह पारंपरिक हवाई यातायात और मौसम की गतिविधियों से काफी ऊपर रहकर काम करता है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें लंबे समय तक एक ही क्षेत्र के ऊपर तैनात रखा जा सकता है।

डीआरडीओ के मुताबिक ये सौर ऊर्जा से संचालित होते हैं और बिना उतरे लगातार कई हफ्तों, महीनों या वर्षों तक हवा में रह सकते हैं। अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले पारंपरिक उपग्रहों की तुलना में इन्हें बनाना और लॉन्च करना काफी सस्ता होता है। यह जमीन पर मौजूद मोबाइल उपकरणों को सीधे हाई-स्पीड इंटरनेट और दूरसंचार सेवाएं प्रदान कर सकता है। इसे सीमाओं पर 24 घंटे रियल-टाइम टोह लेने, जासूसी करने और दुश्मन की हरकतों पर पैनी नजर रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। दूर-दराज या ग्रामीण इलाकों में ब्रॉडबैंड और मोबाइल कनेक्टिविटी का विस्तार करना, प्राकृतिक आपदा के समय अस्थायी रूप से संचार नेटवर्क बहाल करना, मौसम की भविष्यवाणी, कृषि अवलोकन और समुद्री गश्ती में मदद करना इनका मुख्य मकसद है।

रक्षा मंत्री की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने इस प्रोजेक्ट को इस साल की शुरुआत में फरवरी में मंजूरी दी थी। विकसित होने के बाद ये एयरशिप दिन-रात बिना रुके सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात रह सकेंगे और दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखेंगे। खास बात यह है कि जरूरत पड़ने पर इन्हें किसी भी संवेदनशील इलाके के ऊपर या उसके आसपास आसानी से तैनात किया जा सकेगा। इसमें एडवांस इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सिस्टम, हाई-रिजॉल्यूशन डे कैमरा, नाइट विजन और थर्मल इमेजिंग जैसे एडवांस सिस्टम लगाए जाएंगे। ये सिस्टम दुश्मन के इलाके के भीतर गहराई तक गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम होंगे।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म के सफल फ्लाइट ट्रायल के लिए डीआरडीओ, वायु सेना, पीएसयू और इंडस्ट्री को बधाई देते हुए कहा है कि यह सफल ट्रायल लंबे समय तक चलने वाले स्ट्रेटोस्फेरिक एयरशिप को साकार करने की दिशा में भारत की आत्मनिर्भर भारत यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। रक्षा सचिव और डीआरडीओ के चेयरमैन राजेश कुमार सिंह ने भी हाई-एल्टीट्यूड एयरशिप प्लेटफॉर्म के फ्लाइट ट्रायल से जुड़ी टीमों को बधाई दी है। ------------------

हिन्दुस्थान समाचार / सुनीत निगम