साहित्यकार श्रीकांत वर्मा की 40वीं पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजित

 


नई दिल्ली, 25 मई (हि.स.)। साहित्यकार, कवि एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत वर्मा की 40वीं पुण्यतिथि पर सोमवार को नई दिल्ली स्थित कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर हॉल में ‘विश्व हिंदी परिषद’ एवं ‘श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट’ की ओर से ‘श्रीकांत वर्मा स्मरांजलि’ कार्यक्रम आयोजित किया गया।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों, वरिष्ठ साहित्यकारों एवं वर्मा परिवार के सदस्यों की ओर से दिवंगत श्रीकांत वर्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की गयी।

डॉ. अभिषेक वर्मा ने अपने दिवंगत पिता श्रीकांत वर्मा से जुड़ी स्मृतियों तथा ‘श्रीकांत वर्मा सम्मान’ की जानकारी साझा की। उन्होंने श्रीकांत वर्मा की स्मृति में उनके जन्मदिन पर दिए जाने वाले पांच पुरस्कारों के बारे जानकारी दी, जो साहित्य, पत्रकारिता और कला के क्षेत्र में दिए जाएंगे। इसमें साहित्य के क्षेत्र में दिए जाने वाले शिखर सम्मान में 21 लाख रुपये की राशि दी जाएगी, जो भारत में दिए जाने साहित्यिक पुरस्कारों में सबसे अधिक हैं।

इसके बाद आयोजित स्मृति एवं साहित्यिक विमर्श सत्र में अनेक वक्ताओं ने श्रीकांत वर्मा के जीवन और साहित्य के विविध पक्षों पर अपने विचार रखे।

डॉ. विपिन वर्मा ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि श्रीकांत वर्मा ने अपने समय की पीड़ा, लोगों की वेदना और सत्ता की खामोशी को अपनी कविता में अभिव्यक्त किया। सत्ता के नजदीक रहते हुए भी उन्होंने सत्ता से सवाल करने का साहस था। वे अतीत में वर्तमान और वर्तमान में भविष्य को देखते थे। वे भारतीय संस्कृति में विश्वास करते थे और देश के प्रति उनमें गहरा प्रेम था।

डॉ. विपिन ने श्रीकांत वर्मा को देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिए जाने के मांग करते हुए कहा कि इस सम्बंध में केंद्र सरकार को एक ज्ञापन सौंपा जाएगा।

मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने कहा कि श्रीकांत वर्मा किसी भी सभा में अपने वैचारिक और कविता के तेवर को स्थगित नहीं करते थे। वे जो कहना चाहते थे, कह देते थे।

प्रख्यात साहित्यकार एवं कला समीक्षक विनोद भारद्वाज ने ‘कला एवं आलोचना’ विषय पर कहा कि श्रीकांत वर्मा का स्वभाव अपने समय के हिंदी के अन्य साहित्यकारों से बिल्कुल अलग थे। श्रीकांत वर्मा से जुड़े आत्मीय संस्मरण साझा करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया बदल जाती हैं, लेकिन स्मृतियां रह जाती हैं।

वहीं जनसत्ता के पूर्व संपादक ओम थानवी ने ‘श्रीकांत वर्मा के बौद्धिक तेवर’ विषय पर केंद्रित व्याख्यान में कहा कि श्रीकांत बड़े साहित्यकार थे, बड़े पत्रकार थे। वो पत्रकारिता के स्वर्णिम दिन थे, जब साहित्यकार पत्रकारिता में थे।

कला-संस्कृति, फिल्म और रंगमंच समीक्षक रवीन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि समाज में जो हो रहा है, उसको जानने का माध्यम पत्रकारिता है। पत्रकारिता और आधुनिक साहित्य का इतिहास एक दूसरे से जुड़ा है।

शिक्षाविद् प्रो. पूरनचंद टंडन ने कहा, किसी भी व्यक्ति के लिए पूरी बेबाकी के साथ और संवेदना के साथ अपनी बात कहना बड़ा कठिन होता है। श्रीकांत वर्मा के गद्य में उनकी सहृदयता परिलक्षित होती है। उनके साहित्य में युगबोध और कालबोध दिखाई देता है। अपने गद्य में उन्होंने मध्यवर्ग की कुंठा को चित्रित किया है। उनका लेखन बहुत अनुशासित है। उनके लेखन में राष्ट्र सर्वोपरि रहा है।

इस मौके पर डॉ. अभिषेक वर्मा ने श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट की ओर से उपस्थित साहित्यकारों एवं विशिष्ट अतिथियों को श्रीकांत वर्मा की पुस्तक ‘मगध’ और मोती माला भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में दिवंगत श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान, उनके रचनात्मक व्यक्तित्व तथा वैचारिक विरासत पर आधारित चार मिनट के एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी