संस्कृति से परंपरा का सतत प्रवाह बना रहता है: रामबहादुर राय

 


नई दिल्ली, 26 मार्च (हि.स.)। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने गुरुवार को कहा कि संस्कृति से परंपरा का उद्भव होता है और यही परंपरा एक सतत प्रवाह के रूप में समाज को निरंतर आगे बढ़ाती रहती है। उन्होंने जनजातीय समुदायों की गरिमा, उनकी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं सशक्तिकरण पर जोर दिया।

आईजीएनसीए में आयोजित 10वें राष्ट्रीय जनजातीय एवं लोक संस्कृति साहित्य महोत्सव के समापन सत्र को संबोधित करते हुए राय ने कहा कि इस कार्यक्रम ने जनजातीय समुदायों के भविष्य के प्रति नई आशा का संचार किया है। उन्होंने संग्रहालयों को अधिक गतिशील और संवादात्मक बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि उन्हें ऐसे जीवंत स्थलों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जहां लोग अपने इतिहास और सांस्कृतिक स्मृतियों से पुनः जुड़ सकें। उन्होंने बिहार संग्रहालय का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां इतिहास को अनुभवात्मक और जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहां लिखित और अलिखित दोनों परंपराओं को समान महत्व दिया जाता है।

राय ने भाषा, समाज और संस्कृति के गहरे अंतर्संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि भाषा समाज को आकार देती है, समाज से संस्कृति का निर्माण होता है और संस्कृति से परंपरा का निरंतर प्रवाह उत्पन्न होता है। उन्होंने महात्मा गांधी और सत्याग्रह की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण क्षणों ने समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को जन्म दिया। उन्होंने भाषाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रथाओं के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के लिए निरंतर प्रयासों का आह्वान किया।

समापन सत्र में प्रो. अमिताभ पांडे ने संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए सांस्कृतिक और ज्ञान परंपराओं के साथ सतत संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे सहयोगात्मक मंच भविष्य के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलते हैं और कम चर्चित समुदायों को व्यापक पहचान दिलाने में सहायक होते हैं।

वहीं, प्रो. रमेश चंद्र गौर ने अपने उद्बोधन में कहा कि ऐसे निरंतर प्रयास भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति नई चेतना उत्पन्न करते हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपराओं को समृद्ध करने में जनजातीय समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।

प्रो. के. अनिल कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कार्यक्रम की सफलता में योगदान देने वाले सभी प्रतिभागियों, विद्वानों, कलाकारों और सहयोगी संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त किया तथा जनजातीय सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के प्रति आईजीएनसीए की प्रतिबद्धता दोहराई।

महोत्सव के दौरान विभिन्न विषयगत सत्रों में ‘मातृभाषा-आधारित बहुभाषी शिक्षा’ और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में भाषा के महत्व पर चर्चा हुई। इसके अलावा लिपि विकास, भाषाई संरक्षण, लोककथा, कविता और मौखिक परंपराओं पर भी व्यापक विचार-विमर्श किया गया।

दो दिनों तक चले इस महोत्सव ने जनजातीय साहित्य, भाषाओं और ज्ञान परंपराओं को व्यापक शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में स्थापित करते हुए संवाद और सहयोग के नए अवसरों को सुदृढ़ किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार