नमामि गंगे: प्रदूषण नियंत्रण के मानकों का पालन करने वाले उद्योग 39 से बढ़कर 86 फीसदी हुए
नई दिल्ली, 13 अक्टूबर (हि.स.)। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा बेसिन में औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों से निर्धारित मानकों का पालन करने वाले उद्योगों की संख्या वर्ष 2017 के 39 फीसदी से बढ़कर 2025 में 86 फीसदी हो गया है। इस अवधि में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) का भार 26 टन प्रतिदिन से घटकर 7.16 टन प्रतिदिन रह गया। औद्योगिक इकाइयों के नियमित निरीक्षण, अपशिष्ट जल शोधन व्यवस्था की निगरानी, स्वच्छ उत्पादन तकनीकों और जल पुनर्चक्रण पर जोर के जरिए प्रदूषण कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत प्रदूषण फैलाने की अधिक आशंका वाले उद्योगों की पहचान कर उनका वार्षिक निरीक्षण किया जा रहा है। वर्ष 2025 के निरीक्षण चक्र में गंगा बेसिन के 1,296 और यमुना बेसिन के 2,407 सहित कुल 3,703 औद्योगिक इकाइयों का आकलन किया गया। यह प्रक्रिया छह राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश के 113 जिलों में 46 सहायक नदियों और उनकी उपनदियों में प्रदूषण की आशंका को ध्यान में रखकर की गई।
वर्ष 2017 में शुरू की गई इस व्यवस्था के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सहयोग से उद्योगों का निरीक्षण स्वतंत्र तकनीकी संस्थानों के जरिए कराया जाता है। निरीक्षण के दौरान उद्योगों को संचालन की सहमति के तहत मिली शर्तों के अनुपालन, अपशिष्ट जल शोधन संयंत्रों, पानी के नमूनों, जल प्रवाह और प्रदूषण संबंधी मानकों की जांच की जाती है। इनमें पीएच, बीओडी, रासायनिक ऑक्सीजन मांग (सीओडी), कुल निलंबित ठोस पदार्थ (टीएसएस) और कुल घुलित ठोस पदार्थ (टीडीएस) शामिल हैं। ऑनलाइन निगरानी प्रणाली की स्थिति, नालों और जल निकायों में अपशिष्ट जल के प्रवाह तथा भूमिगत जल की स्थिति भी देखी जाती है। अनधिकृत निकासी या शोधन संयंत्र बंद मिलने पर तस्वीरों और वीडियो सहित साक्ष्य दर्ज किए जाते हैं। वर्ष 2026 के निरीक्षण चक्र के लिए 40 तकनीकी संस्थानों को नामित किया गया है, जबकि 2025 में 25 संस्थानों ने हिस्सा लिया था।
मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2025 में आकलन की गई औद्योगिक इकाइयों में से 3,154 चालू थीं। इनमें 2,715 निर्धारित मानकों का पालन कर रही थीं, जबकि 448 चालू इकाइयां नियमों का पालन नहीं कर रही थीं। ऐसे मामलों में संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कारण बताओ नोटिस जारी करने और जरूरत के अनुसार इकाइयों को बंद कराने की कार्रवाई करते हैं।
औद्योगिक प्रदूषण की रोकथाम के लिए कागज एवं लुगदी, चीनी, आसवनी, कपड़ा और चमड़ा उद्योगों के लिए अलग-अलग मानक आधारित चार्टर भी तैयार किए गए हैं। मंत्रालय के अनुसार, ये पांच क्षेत्र पहले के आकलन में गंगा बेसिन की प्रदूषण फैलाने की अधिक आशंका वाली औद्योगिक इकाइयों का करीब 70 फीसदी और कुल प्रदूषण भार का 88 फीसदी हिस्सा थे। इन चार्टर का उद्देश्य पानी और रसायनों की खपत घटाना, ताजे पानी पर निर्भरता कम करना, अपशिष्ट जल का उत्पादन सीमित करना और उसके शोधन के बाद पुनः उपयोग तथा पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना है।
वर्ष 2022 में प्रदूषण भार में अधिक योगदान देने वाली 246 औद्योगिक इकाइयों को प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई के लिए चिह्नित किया गया था। इनके लिए 17 क्षेत्र-विशेष कार्यशालाएं आयोजित की गईं, जिनमें 222 इकाइयों ने हिस्सा लेकर कार्ययोजनाएं प्रस्तुत कीं। शेष 24 इकाइयां या तो बंद हो गईं या उन्होंने शुष्क प्रक्रिया अपनाई। मंत्रालय के आकलन के अनुसार, वर्ष 2021-22 की तुलना में 2022-23 में इन इकाइयों का प्रदूषण भार करीब 65 फीसदी घटकर 18.68 टन प्रतिदिन से 6.381 टन प्रतिदिन रह गया। इसके बाद 156 इकाइयां प्राथमिकता सूची से बाहर हो गईं, जबकि 66 इकाइयों पर प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई जारी रही।
औद्योगिक समूहों में अपशिष्ट जल के शोधन के लिए साझा अपशिष्ट जल शोधन संयंत्रों की भी निगरानी की जा रही है। वर्ष 2025 में गंगा और यमुना के मुख्य प्रवाह वाले राज्यों में 41 ऐसे संयंत्रों का आकलन किया गया, जिनमें से 40 चालू थे। इनकी कुल परिचालन क्षमता 514.53 मिलियन लीटर प्रतिदिन थी और इनमें 286.31 मिलियन लीटर प्रतिदिन पानी का शोधन किया जा रहा था। इनमें से 27 संयंत्र निर्धारित मानकों का पालन कर रहे थे। आकलन के आधार पर संयंत्रों के संचालन एवं रखरखाव में सुधार, शोधन तकनीक के उन्नयन, जैविक शोधन व्यवस्था और उपचारित जल की नियमित जांच जैसे उपाय सुझाए गए।
मंत्रालय के अनुसार, संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के मामले में चीनी उद्योग में भी सुधार दर्ज किया गया है। वर्ष 2017 से 2025 के बीच प्रति टन गन्ने पर ताजे पानी की खपत 155 लीटर से घटकर 58 लीटर रह गई। इसी अवधि में अपशिष्ट जल का उत्सर्जन 190 से घटकर 136 लीटर प्रति टन गन्ना और बीओडी का उत्सर्जन 0.0065 किलोग्राम से घटकर 0.0029 किलोग्राम प्रति टन गन्ना रह गया। कागज एवं लुगदी क्षेत्र में 60 पुनर्चक्रित रेशे पर आधारित मिलें शून्य तरल उत्सर्जन व्यवस्था के तहत काम कर रही हैं। इनके जरिए भूमिगत जल की अनुमानित 928.89 मिलियन लीटर प्रतिदिन बचत और सालाना 1,649.80 मेगावाट ऊर्जा संरक्षण दर्ज किया गया है।
मंत्रालय ने अपने आकलन में कागज एवं लुगदी मिलों से ब्लैक लिकर के उत्सर्जन नहीं होने, आसवनियों से अपशिष्ट जल का उत्सर्जन नहीं होने और रंगीन पानी के बहाव तथा मछलियों की मौत की घटनाएं नहीं होने का भी उल्लेख किया है। इसके अलावा, करीब 719 मिलियन लीटर भूमिगत जल प्रतिदिन बचाने, रामगंगा, कोसी, ढेला और बहेला जैसी सहायक नदियों के जल की गुणवत्ता में सुधार तथा ऊर्जा बचत और कार्बन उत्सर्जन में कमी का दावा किया गया है।
मंत्रालय के अनुसार, इन उपायों का उद्देश्य केवल औद्योगिक इकाइयों से निर्धारित मानकों का पालन कराना नहीं, बल्कि उत्पादन प्रक्रियाओं में प्रदूषण की रोकथाम, पानी का संरक्षण, उपचारित जल का पुनः उपयोग और संसाधनों की दक्षता बढ़ाना है। इसके लिए नियमित निरीक्षण, वैज्ञानिक आकलन, तकनीकी सुधार और नियमों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई को एक साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर