विभाजन नहीं, एकत्व ही हिन्दुत्व का मूल : समाज सहभागिता से ही बनेगा महान राष्ट्र: सुनील आंबेकर
इन्दौर, 26 अप्रैल (हि.स.)। हिन्दुत्व का वास्तविक स्वरूप विभाजन नहीं, एकत्व और समरसता में निहित है। हिन्दुत्व वह भावना है जो समाज को जोड़ती है न कि तोड़ती है। भारत की पहचान इसी एकात्म दृष्टि से निर्मित हुई है और यही कारण है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में देखा जाता है। उक्त बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने रविवार को कहीं।
वे राज्य की आर्थिक राजधानी इंदौर के विजय नगर स्थित जीएसआईएमआर में आयोजित लेखन श्रेणी की प्रमुख जन गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों संपादकों, पत्रकारों, साहित्यकारों, स्तंभ लेखकों और सोशल मीडिया प्रभावकों के समक्ष संघ की विचारधारा, हिन्दुत्व के मायने और उसके आगामी दिशा-दृष्टि को विस्तार से रखा।
श्री आंबेकर ने हिन्दुत्व की व्याख्या करते हुए कहा कि यह विविधता में एकता का प्रतीक है। उन्होंने कहा, “हम दिखने में भले अलग-अलग हों, लेकिन हमारी आत्मा एक ही है। यही अनुभूति हिन्दुत्व का आधार है।” उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दू समाज में कभी भी विभाजन का विचार नहीं रहा, बल्कि यह समाज सदैव समावेश और समन्वय में विश्वास करता है। भारत की सांस्कृतिक यात्रा ही हिन्दू समाज की यात्रा है। आज देश के लोग अपनी पहचान को समझने लगे हैं और विश्व स्तर पर भी भारत की इस सांस्कृतिक पहचान को स्वीकार किया जा रहा है। यही कारण है कि आज “राम” कहने या “वंदे मातरम्” गाने में लोगों को कोई संकोच नहीं है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि निकट भविष्य में हिन्दू समाज वैश्विक स्तर पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करेगा। इसके साथ ही श्री आंबेकर ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने सौ वर्षों के कार्यकाल में समाज और राष्ट्र निर्माण को ही अपना प्रमुख ध्येय बनाया है। एक अच्छे समाज और महान राष्ट्र का निर्माण ही संघ का मूल उद्देश्य रहा है और भविष्य में भी यही दिशा बनी रहेगी।
उन्होंने कहा कि अब समय सिर्फ सहयोग करने तक सीमित नहीं रह गया है, यह सक्रिय सहभागिता का है। समाज को संघ के कार्यों में सहयोगी बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे सहभागी बनकर परिवर्तन की प्रक्रिया में सीधे जुड़ना होगा। इसी संदर्भ में उन्होंने “पंच परिवर्तन” की अवधारणा को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि समाज को इन पांच क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभानी होगी, जिससे राष्ट्र व्यापक परिवर्तन की ओर अग्रसर हो सके।
संघ की सौ वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए श्री आम्बेकर ने बताया कि संगठन ने एक छोटे समूह से शुरुआत की थी, लेकिन समाज के सहयोग से आज यह व्यापक स्वरूप में विकसित हुआ है। इन वर्षों में संघ का उद्देश्य और आधार कभी नहीं बदला, समाज और राष्ट्र सर्वोपरि रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप आज भारतीय समाज में राष्ट्रभाव जागृत हुआ है, जोकि विभिन्न सामाजिक परिवर्तनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जैसे मंदिरों में युवाओं की बढ़ती उपस्थिति और भारतीय संस्कृति के अनुरूप नामकरण की प्रवृत्ति।
उन्होंने “पंच परिवर्तन” के अंतर्गत सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी आचरण और नागरिक कर्तव्यों को प्रमुख बताया। उनका कहना यही था कि सामाजिक समरसता के लिए जातिगत भेदभाव को समाप्त करना आवश्यक है और सभी वर्गों को जोड़कर एक मजबूत समाज का निर्माण करना होगा। पर्यावरण संरक्षण को वैश्विक मुद्दा बताते हुए उन्होंने कहा कि भारत को इसमें नेतृत्व करना चाहिए और पर्यावरण आधारित जीवनशैली अपनाकर आर्थिक समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
कुटुंब प्रबोधन पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि परिवार में भारतीय संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों का समावेश आवश्यक है, जिससे समाज मजबूत बन सके। उन्होंने स्वदेशी जीवनशैली को अपनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आत्मनिर्भरता ही भारत की वास्तविक शक्ति है। नागरिक कर्तव्यों के विषय में उन्होंने कहा कि प्रत्येक भारतीय को अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना चाहिए और उनका पालन करना चाहिए। उन्होंने इसे धर्म के समान बताते हुए कहा कि दैनिक जीवन में इन कर्तव्यों का पालन ही राष्ट्र को सुदृढ़ बनाता है।
कार्यक्रम के एक अन्य सत्र में उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने हिन्दू समाज को एकत्रित कर राष्ट्र निर्माण का जो बीज बोया था, वह आज विशाल वटवृक्ष के रूप में विकसित हो चुका है। कार्यक्रम की शुरुआत भारत माता, डॉ. हेडगेवार और गुरूजी के चित्रों पर माल्यार्पण से हुई तथा समापन “वंदे मातरम्” के साथ किया गया। यह आयोजन संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित विभिन्न जन गोष्ठियों की श्रृंखला का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़कर राष्ट्र निर्माण की दिशा में सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करना है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी