कान्हा से श्रीकृष्ण वंदे जगतगुरु की उपाधि पाने तक बेहद संघर्षमय रहा भगवान कृष्ण का जीवन : मोहन यादव
- श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर केन्द्रित रासलीला समारोह में शामिल हुए मुख्यमंत्री, राधा-कृष्ण की उतारी आरती
भोपाल, 02 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जीवन कभी आसान नहीं रहा, जिन्हें जन्म लेते ही मार डालने का प्रयास किया गया हो, ऐसे शिशु का कान्हा से विश्व को श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान देने वाले श्रीकृष्ण वंदे जगतगुरु की उपाधि पाने तक का जीवन बेहद संघर्षमय और कठिन परिस्थितियों में बीता। निराशा की घनघोर परछाइयों के बावजूद उन्होंने चुनौतियों से कभी मुंह नहीं मोड़ा और अपने जीवन का लोक कल्याण के लिए सदुपयोग किया।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव बुधवार देर शाम भोपाल के रविन्द्र भवन में आयोजित भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर केन्द्रित रासलीला समारोह में उपस्थित दर्शकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने कभी मोह नही रखा। जीवन में जिस व्यक्ति विशेष और वस्तु से उनका सामना हुआ, एक बार वहां से लौटने के बाद दोबारा वे किसी से नहीं मिले। सर्वविदित है कि विश्व के कल्याण के लिए गीता का ज्ञान भी योगीराज भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से ही निकला। श्रीकृष्ण 64 कलाओं, 14 विद्या और 18 पुराणों में निष्णात थे।
रासलीला समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने यहां राधा-कृष्ण की सजीव झांकी में राधा-कृष्ण बने सुधि और सुघढ़ कलाकारों की विशेष आरती उतारी और उनसे आशीष पाया। मुख्यमंत्री ने रासलीला समारोह में दूरदराज से आए कलाकारों के प्रदर्शन की सराहना कर उनका उत्साहवर्धन किया तथा सभी को हलषष्ठी और जन्माष्टमी की अग्रिम बधाई दी।
भगवान श्रीकृष्ण के जहां-जहां चरण पड़े, उन्हें तीर्थ के रूप में विकसित कर रही राज्य सरकार
इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का मध्य प्रदेश से गहरा नाता रहा। वे मध्य प्रदेश आकर यहीं शिक्षित-दीक्षित होकर कान्हा से भगवान श्रीकृष्ण बने। उन्होंने कहा कि मध्यप्र देश में जहां-जहां भगवान श्रीकृष्ण के चरण पड़े हैं, राज्य सरकार उन स्थलों को चिन्हित कर उन्हें श्रीकृष्ण तीर्थ के रूप में विकसित कर रही हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि वे स्वयं 3 सितम्बर को द्वारिका (गुजरात) भ्रमण पर जा रहे हैं।
रासलीला समारोह में संस्कृति, पर्यटन, धार्मिक न्यास और धर्मस्व राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेन्द्र सिंह लोधी, विधायक भगवानदास सबनानी, महापौर मालती राय, तुलसी मानस प्रतिष्ठान के कार्यपालिक अध्यक्ष रघुनंदन शर्मा, मुख्यमंत्री के संस्कृति सलाहकार श्रीराम तिवारी, संस्कृति विभाग के संचालक एनपी नामदेव सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित थे।
संस्कृति विभाग द्वारा रविन्द्र भवन के मुक्ताकाश मंच में सात दिवसीय 'रासलीला समारोह' का भव्य एवं दिव्य आयोजन किया जा रहा है। समारोह में प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की मनोहारी लीलाओं को सौंदर्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में दर्शक इन लीलाओं को देखने एवं देश के सुविख्यात भजन गायकों के भक्ति गायन को सुनने पहुंच रहे हैं। संस्कृति विभाग द्वारा प्राचीन लोककला परम्परा को राज्य स्तरीय आयोजन से प्रदर्शित करने का उद्देश्य युवा पीढ़ी से जुड़ाव एवं आमजन तक इसका प्रचार-प्रसार करना है।
समारोह के पांचवें दिन बुधवार को श्री गोवर्धन लीला एवं रास की भूमिका प्रसंगों का प्रदर्शन ब्रज के पारम्परिक कलाकारों द्वारा किया गया। रासलीला का निर्देशन मथुरा से आए माधव आचार्य द्वारा किया गया। सर्वप्रथम गोवर्धन लीला का प्रदर्शन कलाकारों द्वारा किया गया। ब्रज बोली में इस प्रसंग का प्रदर्शन अत्यंत रोचक था। गोवर्धन लीला श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में प्रकृति, लोकजीवन और ईश्वर-भक्ति के अद्भुत समन्वय का प्रसंग है। जब ब्रजवासी इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे, तब बालकृष्ण ने उन्हें समझाया कि उन्हें अपने जीवन का आधार गोवर्धन पर्वत, गौवंश और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। ब्रजवासियों ने कृष्ण की बात मानकर गोवर्धन पूजा की। इससे इंद्र कुपित हुए और मूसलाधार वर्षा कर ब्रज को संकट में डाल दिया। ब्रजवासियों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका पर गोवर्धन पर्वत धारण किया और ब्रजवासियों को उसके नीचे आश्रय दिया।
यह लीला अहंकार पर विनम्रता, भय पर विश्वास और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की विजय का संदेश देती है। इंद्र का अहंकार समाप्त हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण की महिमा स्वीकार की। गोवर्धन लीला के पश्चात कृष्ण की वंशी की मधुर तान और ब्रज की गोपियों की कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम-भावना रास की भूमिका तैयार करती है। रासलीला को लौकिक प्रेम के रूप में नहीं, बल्कि जीवात्मा और परमात्मा के आध्यात्मिक मिलन एवं अनन्य भक्ति के प्रतीक के रूप में समझा जाता है।
श्रीमद्भागवत के रास पंचाध्यायी प्रसंग में यह भाव अत्यंत मार्मिक रूप से अभिव्यक्त होता है। कृष्ण की बंशी सुनकर गोपियों का उनके प्रति आकृष्ट होना, सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। इस प्रकार गोवर्धन लीला जहाँ संरक्षण, प्रकृति-प्रेम और अहंकार-विनाश का संदेश देती है, वहीं रास की भूमिका भक्ति, प्रेम और आत्मसमर्पण की उस यात्रा का आरंभ है, जिसमें भक्त और भगवान का संबंध सर्वोच्च आध्यात्मिक अनुभूति में रूपांतरित होता है।
भक्ति के सुरों में रची कृष्ण-प्रेम की संध्या
रासलीला समारोह की पांचवी संध्या भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक भावों से सराबोर हो उठी। रूपाली कुसुमकर एवं साथी, जबलपुर के मधुर स्वरों में भक्ति गीतों की प्रस्तुति दी। वातावरण कृष्ण-प्रेम के रंग में रंग गया। ‘श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी’, ‘एक राधा एक मीरा’, ‘तेरे बगैर सांवरिया’, ‘श्याम तेरी बंसी’, ‘मुकुट सिर मोर का’, ‘ओम नमः शिवाय’ और ‘राम सिया राम’ जैसे भक्ति गीतों ने श्रोताओं के मन में श्रद्धा और आनंद का संचार किया। राधा-कृष्ण के प्रेम से लेकर शिव और राम की भक्ति तक, प्रस्तुतियों ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की विविध भावधाराओं को सुरों में पिरोया। गायन में उनका साथ गगनदीप एवं सोनाली कुसुमकर ने दिया। सुनील सोनी ने की-बोर्ड, शुभम ने ऑक्टोपैड, शानू ने ड्रम, फिलिप ने गिटार एवं आनंद ने ढोलक पर संगत से गायन को और भी अधिक प्रभावशाली बनाया।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर