बोत्सवाना से 12 घंटे की हवाई यात्रा कर कूनो पहुंचे 9 चीते, संख्या बढ़कर 48 हुई
भोपाल, 28 फरवरी (हि.स.)। मध्य प्रदेश के श्योपुर जनपद स्थित कूनो नेशनल पार्क में नए मेहमानों का आगमन हो चुका है। बोत्सवाना से 12 घंटे की हवाई यात्रा करने के बाद 9 चीते शनिवार सुबह कूनो पहुंचे। वर्तमान में भारत में चीतों की संख्या 39 है, बोत्सवाना से 9 चीते आने के साथ ही इनकी संख्या 48 हो जाएगी।
पहले जानकारी मिली थी कि बोत्साना से 8 चीते (6 मादा, 2 नर) भारत लाए जाएंगे, लेकिन शनिवार सुबह कुल 9 चीते विशेष विमान से ग्वालियर पहुंचे, इनमें 6 मादा और 3 नर चीते शामिल हैं। ग्वालियर से हेलीकॉप्टर के जरिए सुबह करीब 9:30 बजे चीतों को कूनो नेशनल पार्क लाया गया और यहां लाकर सभी को सीधे क्वारंटीन बाड़ों में शिफ्ट कर दिए गया है।
चीतों के आने पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव खुद कूनो पहुंचे। उन्होंने क्रेट का हैंडल घुमाकर दो चीतों को क्वारंटीन बाड़े में रिलीज किया। बाकी चीतों को वन विभाग की प्रशिक्षित टीम ने तय प्रोटोकॉल के तहत शिफ्ट किया।
कूनो में पहले 26 वयस्क चीते थे, जिनमें 14 नर और 12 मादा थीं। अब 9 नए चीतों के जुड़ने से वयस्कों की संख्या 35 हो गई है, जिनमें 18 मादा और 17 नर चीते हो गए हैं। अब तक कूनो नेशनल पार्क में नर चीतों का पलड़ा भारी था, लेकिन इस खेप ने संतुलन की तस्वीर बदल दी है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इससे आने वाले महीनों में प्रजनन की रफ्तार तेज हो सकती है।
बोत्सवाना से आए सभी 9 चीतों को एक महीने तक क्वारंटीन बाड़ों में रखा जाएगा। इस दौरान उनकी सेहत, व्यवहार और अनुकूलन क्षमता पर लगातार नजर रहेगी। इसके बाद चीता स्टीयरिंग समिति तय करेगी कि किन चीतों को खुले जंगल में छोड़ा जाए और किन्हें निगरानी में रखा जाए। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, हर चीते को जंगल में उतारने से पहले उसके मूवमेंट, शिकार प्रवृत्ति और इंसानी दखल से दूरी जैसे पहलुओं की बारीकी से जांच की जाती है।
अरावली पर्वत शृंखला की सुरम्य पहाड़ियों के बीच कूनो नेशनल पार्क में विभिन्न प्रकार के 174 पक्षियों की प्रजातियां मौजूद हैं, इसके साथ ही सैकड़ों प्रजातियां वन्य जीवों की है। पक्षियों की 12 प्रजाति तो दुलर्भ श्रेणी में मानी गई हैं। प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर के आगोश में बहने वाली कूनो नदी इसे न केवल ओर भी अधिक खूबसूरत बना देती है, बल्कि इसके सपाट और चौडे़ तटो पर खिली हुई धूप में अठखेलियां करते मगरमच्छ यहां आने वाले लोगों को रोमांचित कर देते है।
वर्ष 1952 में भारत में एशियाई चीतों के विलुप्त होने के बाद से भारत में चीतो को फिर से स्थापित करने की योजना चल रही थी। इसी उद्देश्य के लिए सिंतबर, 2009 में राजस्थान के गजनेर में चीता विशेषज्ञों की एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें चीता संरक्षण कोष के डॉ. लोरी मार्कर, स्टीफन जेओ ब्रायन एवं अन्य चीता विशेषज्ञों ने दक्षिण अफ्रीकी चीता को भारत लाने सिफारिश की थी।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर