भोजशाला मामले में जैन समाज की भी एंट्री, कहा- हमें भी मिले पूजा का अधिकार
- महाधिवक्ता ने रखा शासन का पक्ष
इंदौर, 06 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में चल रही नियमित सुनवाई के दौरान बुधवार को जैन समाज की एंट्री ने कानूनी और धार्मिक बहस को और तेज कर दिया है। जैन समाज ने भी याचिका दायर पर भोजशाला में पूजा के अधिकार की मांग की है। इसके साथ ही महाधिवक्ता ने न्यायालय में शासन का पक्ष रखा।
भोजशाला मामले में मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान जैन समाज की ओर से उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश प्रसाद राजभर ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जैन समाज भोजशाला पर दावा नहीं करता, लेकिन यह चाहता है कि उसे भी पूजा का अधिकार मिले।
अधिवक्ता राजभर ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्राचीन संदर्भों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि राजा भोज ने यह भूमि जैन आचार्य मानतुंग को दान में दी थी। मानतुंग वही आचार्य हैं, जिन्होंने जैन धर्म के प्रसिद्ध धार्मिक सूत्र ‘भक्तामर स्तोत्र’ की रचना की थी। उन्होंने कोर्ट में कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने सात अप्रैल 2003 को जारी आदेश में हर मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और मुस्लिमों को हर शुक्रवार को नमाज की अनुमति दे दी, लेकिन जैन समाज के धर्मावलंबियों के लिए कुछ नहीं कहा। भोजशाला जैन गुरुकुल है। राजा भोज ने ही इसका निर्माण कराया था। उस समय बड़ी संख्या में जैन शोधार्थी यहां अध्ययन करते थे। एएसआई के सर्वे में जो मूर्तियां मिली हैं, उन्हें जैन धर्म के देवी-देवताओं की मूर्तियों के रूप में संरक्षित किया जाए। लंदन संग्रहालय में रखी मूर्ति जैन यक्षिणी अंबिका की है। इसे लंदन से वापस लाया जाए।
माउंट आबू जैन मंदिर का हवाला
दिल्ली से वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े अधिवक्ता राजभर ने करीब एक घंटे तक अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि राजा भोज जैन समाज के भी संरक्षक थे। सर्वे में मिले साक्ष्य बताते हैं कि भोजशाला में जो कालम हैं, वे माउंट आबू जैन मंदिर की तरह बने हैं। सर्वे में प्राकृत भाषा में लिखे श्लोक और लेख मिले हैं, जो बताते हैं कि यहां बड़ी संख्या में जैन शोधार्थी अध्ययन करते थे। राजभर ने एएसआई को घेरते हुए कहा कि वह एक धर्म विशेष का समर्थन कर रहा है।
अधिवक्ता राजभर ने कहा कि जैन समाज के 24 तीर्थंकर हैं। प्रत्येक तीर्थंकर के लिए एक पशु का चिह्न आरक्षित है। जैसे आदिनाथ भगवान के लिए बैल और महावीर भगवान के लिए शेर का चिह्न होता है। भोजशाला के सर्वे में पशुओं के चिह्न मिले हैं। ये चिह्न जैन समाज के तीर्थंकरों के लिए पहचाने जाने वाले पशुओं के हैं, जो बताते हैं कि भोजशाला जैन गुरुकुल था।
उन्होंने कहा कि जैन समाज की यह लड़ाई किसी धर्म के विरोध में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सच्चाई और संवैधानिक अधिकारों की मांग को लेकर है। जैन समाज ने यह भी दावा किया कि लंदन में संरक्षित वाग्देवी प्रतिमा और उससे जुड़े शिलालेख भोजशाला के जैन इतिहास की पुष्टि करते हैं। इन्हीं तथ्यों के आधार पर समाज ने भोजशाला परिसर में पूजा-अर्चना के समान अधिकार की मांग कोर्ट से की है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने अधिवक्ता राजभर से सवाल-जवाब भी किए। कोर्ट ने कहा कि वह पहले तो यह स्पष्ट करें कि भोजशाला को जैन मंदिर सिद्ध करना चाहते हैं या जैन गुरुकुल, क्योंकि दोनों अलग-अलग होते हैं। इस पर राजभर ने कहा कि वह इंदौर आकर व्यक्तिगत रूप से अपनी बात कोर्ट के समक्ष रखना चाहते हैं। कोर्ट ने उन्हें इसकी अनुमति देते हुए कहा कि वे गुरुवार को उपस्थित हो सकते हैं।
इसके बाद उच्च न्यायालय में महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने भी शासन का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जब भी बसंत पंचमी शुक्रवार को आती है, धार में विवाद की स्थिति बन जाती है। हर बार बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों, अधिकारियों को व्यवस्था संभालने के लिए मैदान में उतरना पड़ता है। उन्होंने एएसआई के सर्वे में मिले साक्ष्यों से अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि सर्वे में यह बात सिद्ध हुई है कि भोजशाला मंदिर ही है। महाधिवक्ता के तर्क अधूरे रहे जिन्हें कोर्ट गुरुवार को सुनेगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर