आदि शंकराचार्य के विचारों को वैश्विक स्तर तक पहुंचाए : शंकराचार्य विधुशेखर भारती

 


- ओंकारेश्वर में पांच दिवसीय एकात्म पर्व का भव्य समापन

इंदौर, 21 अप्रैल (हि.स.)। श्रृंगेरी शारदा पीठम (कर्नाटक) के जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखर भारती ने कहा कि आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत को एक सूत्र में बाँधने के लिए चारों दिशाओं में आम्नाय पीठों की स्थापना की, जहाँ से एकता और अद्वैत का संदेश प्रसारित हुआ। ऐसे प्रकल्पों की आज अत्यंत आवश्यकता है, जो आदि शंकराचार्य के विचारों को वैश्विक स्तर तक पहुंचाएं।

जगद्गुरु श्रृंगेरी शंकराचार्य विधुशेखर भारती मंगलवार को मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में आयोजित पांच दिवसीय शंकर प्रकटोत्सव एकात्म पर्व के समापन समारोह में वीडियो माध्यम से आशीर्वचन प्रदान कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आज उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ऐसे प्रयास जरूरी हैं, जो आदि शंकराचार्य के दर्शन को जन-जीवन में स्थापित करें और विश्व पटल पर प्रभावी रूप से प्रस्तुत करें।

ओंकारेश्वर के मांधाता पर्वत पर स्थित एकात्म धाम में आयोजित एकात्म पर्व का समापन मंगलवार को जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि, चिन्मय मिशन के पूर्व वैश्विक प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती, मप्र के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी, दक्षिणामूर्ति मठ के प्रमुख स्वामी पूर्णानंद गिरी, माँ पूर्ण प्रज्ञा, प्रख्यात शिक्षाविद् गौतम भाई पटेल, महंत मंगलदास त्यागी तथा वेंकटेश्वर वेद विज्ञान पीठम् के प्राचार्य ब्रह्मर्षि कुप्प शिव सुब्रमण्यम अवधानी की उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम में इस वर्ष के अद्वैत युवा जागरण शिविर के शंकरदूतों ने एकात्मता का संकल्प लिया।

ओंकारेश्वर से उठी एकात्मता की पुकार, उद्बोधन में विश्व शांति का संकल्प

स्वामी अवधेशानंद गिरि ने अपने वक्तव्य में एकात्मता के वैश्विक संदेश को प्रसारित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब शंकरदूत केवल भारत तक सीमित न रहें, बल्कि आचार्य शंकर भगवत्पाद का संदेश लेकर विश्व के प्रत्येक कोने तक पहुँचें। उन्होंने स्वीकार किया कि अब तक हम अपने धर्म और दर्शन का वैश्विक स्तर पर पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं कर सके, परंतु अब यह सीमा तोड़ने का समय है। उन्होंने आचार्य शंकर के योगदान की तुलना द्वापर युग के वेदव्यास से करते हुए कहा कि जिस प्रकार वेदव्यास ने ज्ञान को व्यवस्थित किया, उसी प्रकार शंकराचार्य ने उसे पुनर्जीवित कर समाज तक पहुँचाया।

प्रकट न होते शंकर तो, तमस में रहता ज्ञान : स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती

बीज वक्तव्य में स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती ने अपने विचार रखते हुए कहा कि यदि शंकराचार्य का प्राकट्य न हुआ होता, तो ज्ञान अज्ञान के अंधकार में ही डूबा रहता। “प्रकट न होते श्री शंकर तो, तमस में रहता ज्ञान,उनकी कृपा हो हम सब पर ही, और रहे कृपा का भान।”यह संबोधन अद्वैत की गहराई को उजागर करने के साथ-साथ जीवन में एकत्व की भावना को अपनाने का संदेश देता है।

अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रदेश के संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कहा कि आज का दिन केवल उत्सव नहीं, भारत की पारंपरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है। मात्र 12 वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत होना ,उनके ईश्वरीय स्वरूप का प्रमाण है। जब वह संन्यासी होकर निकले तो उनके दिव्य चरण यहीं ओंकारेश्वर की धरती पर आ पहुंचे। नर्मदा के तट पर जब भगवत्पाद गोविन्दं ने उसने पूछा कि तुम कौन हो तो उन्होंने जवाब में कहा चिदानंद रूपः, शिवोहम शिवोहम। उन्होंने कहा कि एकात्म धाम को मप्र शासन द्वारा एकात्मता के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करते हुए 2400 करोड़ की लागत से एकात्म धाम का निर्माण किया जा रहा है।

दक्षिणामूर्ति मठ, वाराणसी के प्रमुख स्वामी पूर्णानंद गिरि ने अद्वैत वेदांत की परंपरा और उसके साधना पक्ष को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब वर्तमान समय में पूरी दुनिया विनाश की कगार पर खड़ी है तब भी भारत विश्व में सुख और शांति का अनुभव कर रहा है। यह शंकराचार्य जैसे महान संतों के चरण विन्यास और उनके प्रभाव का ही फल है कि इस भूमि ने पवित्रता प्राप्त की है और आज के समय में भी हम शांति की अनुभूति कर रहे हैं जो कोई साधारण बात नहीं है। स्वामिनी सद्विद्यानंद सरस्वती ने सभी सत्रों का सार प्रस्तुत करते हुए अद्वैत की समृद्ध परंपरा और विभिन्न संप्रदायों के योगदान को रेखांकित किया।

आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास की आवासी आचार्य माँ पूर्णप्रज्ञा ने कहा कि शंकराचार्य का जीवन केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज में एकता, धर्म और आध्यात्मिक जागरूकता का संदेश भी फैलाया। उनका संपूर्ण जीवन त्याग, तपस्या और मानव कल्याण के लिए समर्पित रहा, जो आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

अद्वैत, पर्यावरण और तकनीक का संगम, एकात्म पर्व से विश्व तक संदेश

मंचस्थ अतिथियों का स्वागत एवं एकात्म पर्व के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए प्रो. यज्ञेश्वर शास्त्री ने कहा कि अद्वैत वेदांत के लोकव्यापी प्रसार के माध्यम से वैश्विक एकात्मता का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। न्यास का मुख्य उद्देश्य मानवता को संत्रासों से उबारने के लिए एकात्म बोध से अनुप्राणित करना है। इस विजन के अंतर्गत ओंकारेश्वर में आचार्य शंकर की 108 फीट ऊंची 'एकात्मता की मूर्ति', शंकर संग्रहालय और अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान की स्थापना का कार्य तीव्र गति से जारी है।

आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास के उप मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. शैलेन्द्र मिश्रा ने स्वागत भाषण में शंकराचार्य के प्राकट्योत्सव के अवसर पर बताया कि ओंकारेश्वर को एकात्मता के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। उन्होंने 2025 में प्रयागराज में आयोजित एकात्म धाम शिविर का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें अद्वैत वेदांत पर केंद्रित संवाद, ध्यान, शास्त्रार्थ और वैदिक अनुष्ठानों का सफल आयोजन हुआ। आगामी सिंहस्थ 2028 से पूर्व जनवरी से अप्रैल 2027 तक कलाड़ी से केदारनाथ तक लगभग 17 हजार किलोमीटर की “एकात्म यात्रा” प्रस्तावित है, जिसमें विभिन्न आध्यात्मिक संस्थाएं सहभागी होंगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर