जल अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए ‘महा ऑन वाटर’ कार्यक्रम शुरु, इसरो से एमओयू

 


नई दिल्ली, 01 जून (हि.स.)। देश में जल संसाधन प्रबंधन, पेयजल सुरक्षा और जल संरक्षण के क्षेत्र में अनुसंधान एवं नवाचार को नई गति देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने ‘मिशन फॉर एडवांसमेंट ऑफ हाई-इम्पैक्ट एरियाज फॉर वॉटर’ (महा ऑन वाटर) कार्यक्रम की शुरुआत की है। इस महत्वाकांक्षी पहल के तहत जल शक्ति मंत्रालय और राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) संयुक्त रूप से 200 करोड़ रुपये का निवेश करेंगे।

जल शक्ति मंत्रालय ने सोमवार को डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र, नई दिल्ली में जल क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला का उद्घाटन केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी और वी सोमन्ना भी उपस्थित रहे।

कार्यशाला में स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को प्रोत्साहित करने के लिए उत्पाद एवं प्रोटोटाइप विकास के लिए कंपनियों और स्टार्टअप्स को आमंत्रित भी किया गया है। साथ ही जल शक्ति मंत्रालय और इसरो के बीच उपग्रह आधारित जल अनुसंधान, जल गुणवत्ता निगरानी, नदी प्रवाह विश्लेषण तथा जल संरक्षण तकनीकों के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ‘महा ऑन वॉटर’ (जल के लिए उच्च-प्रभाव वाले क्षेत्रों में प्रगति का मिशन) की शुरुआत थी। यह जल शक्ति मंत्रालय और एएनआरएफ की एक संयुक्त पहल है। इसका उद्देश्य जल संसाधन प्रबंधन, पेयजल, जलवायु अनुकूलन और जल-उपयोग दक्षता जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में अत्याधुनिक अनुसंधान को बढ़ावा देना है। इस पहल के तहत अनुसंधान प्रस्तावों के लिए 'ओपन कॉल' (खुला आमंत्रण) दिया गया।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने जल को भारत की सभ्यता की आधारशिला बताते हुए कहा कि जल जीवन मिशन देश की विकास यात्रा का महत्वपूर्ण आधार है। राष्ट्रीय जल मिशन के तहत देशभर में 300 से अधिक अनुसंधान इकाइयों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जिनमें से 100 से अधिक को विशेष सहायता प्राप्त है। उन्होंने जल संरक्षण अभियान ‘जल संचय’ की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जून 2025 से शुरू हुए अभियान में पहले वर्ष में 10 लाख जल संरचनाओं का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन जनभागीदारी से 27 लाख से अधिक संरचनाएं तैयार की गईं। अगले चरण में निर्धारित 1 करोड़ संरचनाओं का लक्ष्य समय से पहले ही पूरा कर लिया गया है और अब इसे बढ़ाकर 2 करोड़ कर दिया गया है।

उन्होंने सभी नागरिकों से जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की अपील की और बताया कि वर्तमान में 20 विभिन्न डिजाइनों पर जल संरक्षण कार्य किया जा रहा है।

कार्यशाला में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि जल क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास केवल सरकार की नहीं बल्कि पूरे देश की साझा जिम्मेदारी है, जिसमें निजी क्षेत्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में इसमें कई गुना वृद्धि की संभावना है। उपग्रह तकनीक का उपयोग अब जनकल्याणकारी योजनाओं में व्यापक रूप से किया जा रहा है और इसरो की विशेषज्ञता अन्य मंत्रालयों के लिए भी उपयोगी साबित हो रही है। तटीय राज्यों में पेयजल संकट के समाधान के लिए पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के साथ नया समझौता किया जाएगा, जबकि जल शोधन के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी और सीएसआईआर के साथ संयुक्त परियोजनाएं चलाई जा रही हैं।

कार्यशाला में तकनीकी सत्रों के दौरान अनुसंधान एवं विकास प्रभाग द्वारा 113 पूर्ण अध्ययनों पर प्रस्तुति दी गई। राष्ट्रीय जल विज्ञान कार्यक्रम का अवलोकन किया गया तथा गाजीपुर लैंडफिल साइट के लिए लीचेट ट्रांसपोर्ट मॉडलिंग, जलाशय प्रबंधन और कृषि क्षेत्र में जल उपयोग जैसे विषयों पर वैज्ञानिक प्रस्तुतियां दी गईं। इसके अलावा, किसानों पर आधारित अध्ययन और जल प्रबंधन तकनीकों पर भी विस्तृत चर्चा हुई।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर