पशुओं में खुरपका-मुंहपका रोग से निपटने की तैयारी को लेकर आयोजित ‘वज्र-सैट’ राष्ट्रीय अभ्यास संपन्न
- 25 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों के 83 प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
- रोग की शीघ्र पहचान, प्रयोगशाला जांच और समन्वित नियंत्रण व्यवस्था पर हुआ मंथन
बेंगलुरु, 06 नवंबर (हि.स.)। पशुओं में फैलने वाले खुरपका-मुंहपका रोग (एफएमडी) के एसएटी-1 स्वरूप के संभावित प्रसार से निपटने की तैयारियों को मजबूत करने के उद्देश्य से बेंगलुरु में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय अभ्यास ‘वज्र-सैट’ शुक्रवार को संपन्न हो गया। चार और पांच नवंबर को आयोजित इस अभ्यास में 25 राज्यों, तीन केंद्रशासित प्रदेशों और विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों के 83 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
इस अभ्यास का आयोजन भारत सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग और बेंगलुरु स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पशु चिकित्सा महामारी विज्ञान एवं रोग सूचना संस्थान (आईसीएआर-निवेदी) के समन्वय से किया गया। ‘जल्दी पहचानें, तेजी से पुष्टि करें और मिलकर नियंत्रण करें’ के ध्येय वाक्य के साथ आयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य पशुओं के स्वास्थ्य, किसानों की आजीविका और पशुपालन अर्थव्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
खुरपका-मुंहपका रोग का एसएटी-1 स्वरूप अब तक भारत में सामने नहीं आया है। हालांकि, अफ्रीका से पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों तक इसके भौगोलिक प्रसार को देखते हुए एहतियात के तौर पर यह अभ्यास आयोजित किया गया।
इसमें राज्यों के पशुपालन विभागों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों, पशु चिकित्सा रोग निदान प्रयोगशालाओं, पशु चिकित्सा विश्वविद्यालयों, टीका निर्माण संस्थानों तथा रक्षा और सीमा सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। अभ्यास के दौरान रोग के प्रसार से जुड़ी काल्पनिक परिस्थितियां तैयार की गईं। इनके आधार पर रोग की शीघ्र पहचान, प्रयोगशाला परीक्षण से पुष्टि, महामारी विज्ञान संबंधी जांच, पशुओं की आवाजाही पर नियंत्रण, आपातकालीन टीकाकरण की तैयारी, जोखिम संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान और विभिन्न विभागों के बीच समन्वित कार्रवाई जैसे विषयों पर चर्चा की गई।
चार नवंबर को आयोजित उद्घाटन सत्र में पशुपालन विभाग की आयुक्त डॉ. नवीन बीएम ने समय रहते तैयारी करने, रोग की शुरुआती पहचान, त्वरित कार्रवाई तथा केंद्र और राज्य की संस्थाओं के बीच प्रभावी समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया।
आईसीएआर-निवेदी के निदेशक डॉ. बलदेव आर. गुलाटी ने एसएटी-1 स्वरूप से जुड़ी बदलती महामारी संबंधी स्थिति की जानकारी दी। उन्होंने जोखिम आधारित निगरानी, महामारी विज्ञान संबंधी आंकड़ों के संग्रह और पूर्व चेतावनी प्रणालियों के महत्व को रेखांकित किया।
आईसीएआर-राष्ट्रीय खुरपका-मुंहपका रोग संस्थान के निदेशक डॉ. जेके महापात्र ने प्रयोगशालाओं की तैयारी, शीघ्र रोग निदान और टीकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई। वहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के निदेशक ब्रिगेडियर एमएम रामचंद्र ने सीमापार पशु रोगों के प्रसार को रोकने के लिए विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय और सीमावर्ती क्षेत्रों में सतर्कता बरतने पर जोर दिया।
पांच नवंबर को आयोजित समापन सत्र की अध्यक्षता पशुपालन विभाग के अतिरिक्त सचिव (पशु स्वास्थ्य) रामाशंकर सिन्हा ने की। उन्होंने राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर रोग नियंत्रण की तैयारियों को मजबूत करने की आवश्यकता बताई। साथ ही, आईसीएआर-एनआईएफएमडी के तकनीकी सहयोग से क्षेत्रीय खुरपका-मुंहपका रोग प्रयोगशालाओं और क्षेत्रीय रोग निदान प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया।
समापन सत्र में रोग संबंधी सूचनाओं का समय पर प्रसार, प्रयोगशालाओं में त्वरित पुष्टि, निरंतर निगरानी, पशुओं की आवाजाही पर नियंत्रण, टीकाकरण की तैयारी और राज्यों के बीच समन्वय को प्राथमिकता देने पर सहमति बनी। अभ्यास के दौरान प्राप्त सुझाव और सिफारिशें एसएटी-1 स्वरूप के संभावित प्रसार से निपटने के लिए राष्ट्रीय तैयारियों और समन्वित प्रतिक्रिया व्यवस्था को मजबूत करने में सहायक होंगी।
इसी क्रम में पांच नवंबर को खुरपका-मुंहपका रोग मुक्त क्षेत्र के निर्धारण को लेकर अलग से तकनीकी बैठक भी आयोजित की गई। पशुपालन विभाग के अतिरिक्त सचिव और आयुक्त की सह-अध्यक्षता में हुई इस बैठक में विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
बैठक में वीर्य उत्पादन केंद्रों और वीर्य बैंकों को खुरपका-मुंहपका रोग मुक्त क्षेत्र के रूप में मान्यता देने के विषय पर चर्चा हुई। इस पहल का उद्देश्य रोग की रोकथाम को मजबूत करना, मूल्यवान पशुधन के आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण करना और सुरक्षित पशुधन व्यापार को बढ़ावा देना है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश एम.बी.