पद्मश्री इंजीनियर डॉ. गिरीश भारद्वाज का निधन, 'झूला पुलों के सरदार' के रूप में मिली थी देशव्यापी पहचान
बेंगलुरु, 07 जुलाई (हि.स.)। कम लागत में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए झूला पुलों के निर्माण की अभिनव तकनीक विकसित कर लाखों लोगों का जीवन आसान बनाने वाले पद्मश्री सम्मानित इंजीनियर डॉ. गिरीश भारद्वाज का मंगलवार तड़के निधन हो गया। हृदय संबंधी बीमारी के कारण उन्होंने दक्षिण कन्नड़ जिले के सुलिया स्थित केवीजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह 76 वर्ष के थे। उनके निधन से इंजीनियरिंग जगत और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में शोक की लहर है।
डॉ. गिरीश भारद्वाज के निधन पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि राज्य ने एक दुर्लभ तकनीकी प्रतिभा और समाजसेवी इंजीनियर को खो दिया है। उन्होंने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों को संपर्क सुविधा से जोड़कर जनजीवन को सुगम बनाने में डॉ. भारद्वाज का योगदान सदैव याद रखा जाएगा। उनके कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
डॉ. गिरीश भारद्वाज को देशभर में 'झूला पुलों के सरदार' और 'सुलिया के विश्वेश्वरैया' के नाम से जाना जाता था। उन्होंने ग्रामीण भारत के विकास को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया और देश के विभिन्न राज्यों में 140 से अधिक झूला पुलों का निर्माण कर हजारों गांवों को संपर्क सुविधा उपलब्ध कराई। उनके बनाए पुलों ने लाखों लोगों के लिए आवागमन को सुरक्षित, सरल और सुगम बनाया।
मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक डॉ. भारद्वाज ने औद्योगिक क्षेत्र में करियर बनाने के बजाय ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी। उन्होंने 'आयशिल्प इंजीनियरिंग वर्क्स' की स्थापना की और कम लागत, कम समय तथा स्थानीय संसाधनों के उपयोग से सुरक्षित झूला पुलों के निर्माण की तकनीक विकसित की। उनके इस मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सराहना मिली और इसे ग्रामीण संपर्क व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना गया।
कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों के दूर-दराज और दुर्गम क्षेत्रों में उनके नेतृत्व में सैकड़ों झूला पुलों का निर्माण किया गया। उत्तर कन्नड़ के अंकोला, मंगलुरु और अन्य ग्रामीण इलाकों में बने इन पुलों ने नदियों और नालों से कटे गांवों को जोड़कर लोगों की दैनिक आवाजाही, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आर्थिक गतिविधियों को नई गति दी।
सुलिया के मंडेकोलु में निर्मित उनका 100वां झूला पुल विशेष रूप से चर्चित रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में उनके योगदान के कारण लोग उन्हें स्नेहपूर्वक 'सुलिया के विश्वेश्वरैया' और 'झूला पुलों के सरदार' कहकर संबोधित करते थे। समाज और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से भी अलंकृत किया था।------------
हिन्दुस्थान समाचार / राकेश एम.बी.