अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलना चाहिए : उपराष्ट्रपति
नई दिल्ली, 03 अक्टूबर (हि.स.)। उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने शनिवार को कहा कि तेजी से बदलती परिस्थितियों के दौर में निर्णय लेने की क्षमता को व्यापक सहमति के साथ जोड़ना जरूरी है और लोकतंत्र में बहस एवं चर्चा अंततः ऐसे फैसलों की ओर ले जानी चाहिए जिन्हें व्यापक स्वीकार्यता हासिल हो।
पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत को ऐसी आर्थिक नीतियों की आवश्यकता है जो लचीली, समावेशी और परिस्थितियों के अनुरूप हों। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र एवं पारदर्शी बहस लोकतंत्र को मजबूत करती है लेकिन अधिकारों और कर्तव्यों को साथ-साथ चलना चाहिए।
राज्यसभा के सभापति ने कहा कि भारत ने यह प्रदर्शित किया है कि लोकतंत्र और विकास एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक ढांचे में आर्थिक वृद्धि और समावेशी प्रगति के साथ सहमति निर्माण ने आर्थिक सुधारों को अधिक टिकाऊ बनाया है। उन्होंने इसे 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बताया।
राधाकृष्णन ने कहा कि आर्थिक लचीलेपन को सामाजिक लचीलेपन से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने वित्तीय समावेशन, पारदर्शिता और अर्थव्यवस्था के औपचारिकी करण को मजबूत करने में जनधन-आधार-मोबाइल (जेएएम), प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की भूमिका का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि अगस्त तक 59 करोड़ से अधिक जनधन खाते खोले जा चुके हैं, जबकि जीएसटी पंजीकरण 2017 में करीब 66.5 लाख से बढ़कर मई में 1.65 करोड़ हो गए। उन्होंने कहा कि ये पहल लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने के साथ पारदर्शिता और वित्तीय समावेशन को मजबूत करने में मदद कर रही हैं।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि समावेशन का अर्थ केवल लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल करना नहीं है, बल्कि उन्हें मूल्य सृजित करने, आय अर्जित करने और उद्यमी बनने में सक्षम बनाना भी है। उन्होंने करीब 92 लाख स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 10 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाओं और 3.46 करोड़ से अधिक ‘लखपति दीदियों’ का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा और अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भारत में महिला सशक्तीकरण से महिला-नेतृत्व वाले विकास की ओर बदलाव को दर्शाती है।
राधाकृष्णन ने कहा कि लचीलापन केवल बड़े कारोबारी संस्थानों और वित्तीय बाजारों में नहीं बनता बल्कि तब भी मजबूत होता है जब गांव की एक महिला का बैंक खाता हो, उसे सरकारी लाभ सीधे मिले, वह औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़े और अपने स्वयं सहायता समूह को उद्यम में बदल सके। उन्होंने कहा कि 25 करोड़ से अधिक भारतीय अत्यधिक गरीबी से बाहर आए हैं और इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया।
उन्होंने कहा कि देश की विकास यात्रा में प्रत्येक राज्य, जिला और गांव को समान भागीदार बनाना होगा। उन्होंने नीतियां तैयार करते समय जमीनी वास्तविकताओं को समझने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप उन्हें लचीला एवं उत्तरदायी बनाए रखने पर जोर दिया।
उपराष्ट्रपति ने शोध और संस्थागत सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया तथा दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के बीच सहयोग का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ऐसे सहयोग से शोध, शिक्षा, नवाचार और उद्यमिता को मजबूती मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि भारत का लचीलापन बदलाव का विरोध करने से नहीं बल्कि आत्मविश्वास, समावेशन और सामूहिक प्रयास की भावना के साथ उसे स्वीकार करने से आएगा। पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन का आयोजन ‘बदलाव के दौर में लचीलापन’ विषय पर किया गया है। इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के अध्यक्ष एन. के. सिंह, बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष डॉ. माइकल देबब्रत पात्रा समेत अन्य गणमान्य लोग इस अवसर पर मौजूद थे।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार