छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी मामले में फांसी की सजा के बाद परिजनों ने सरकार से लगाई राहत की गुहार
बीजापुर, 19 सितंबर (हि.स.)। छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी हमले के मामले में विशेष एनआईए न्यायालय द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा के बाद बीजापुर जिले के मनकेली क्षेत्र के झीरम घाटी के आरोपितों के परिजनों और ग्रामीणों ने सरकार से राहत की गुहार लगाई है।
मनकेली पंचायत की सरपंच कमला कोरसा के नेतृत्व में ग्रामीणों और परिजनों ने आज शनिवार को मीडिया के सामने अपनी पीड़ा रखते हुए कहा कि लंबे समय से जेल में बंद तीन ग्रामीणों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कानूनी स्तर पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। झीरम घाटी हमले से जुड़े इस मामले में मृत्युदंड के फैसले के बाद सामने आई यह मांग बस्तर में लंबे समय तक चले नक्सल हिंसा के दौर में ग्रामीणों की भूमिका और उनके सामने मौजूद परिस्थितियों को लेकर एक नई बहस भी सामने ला रही है।
इस दौरान सरपंच कमला कोरसा के अलावा झीरम के आरोपितों के परिजनों चमरू मोडियाम, मुन्ना मोडियाम, सुभाष लेकाम, चमरू कुरसम, लकमी कोरसा, सोमली हेमला सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण का कहना है कि झीरम के आरोपितों जिन्हे मृत्युदंड की सजा हुई है, उसमें से मनकेली निवासी सुमित्रा मोडियाम, मुनगा निवासी चेतु लेकाम और गोरना निवासी प्रमिला मोडियाम पिछले करीब दस वर्षों से जेल में बंद हैं।
झीरम घाटी मामले में विशेष एनआईए अदालत द्वारा उन्हें मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद उनके परिवारों में चिंता और बढ़ गई है। परिजनों का कहना है कि वर्षों से जेल और अदालत के चक्कर काटते-काटते वे आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान हो चुके हैं। परिजनाें ने सरकार से आग्रह किया कि मामले में उपलब्ध कानूनी विकल्पों के तहत एक बार फिर सभी पहलुओं पर विचार किया जाए और सजा में राहत देने की संभावना पर गौर किया जाए। परिजनों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांग पर विचार नहीं किया गया तो वे रायपुर और जगदलपुर पहुंचकर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होंगे।
मनकेली सरपंच कमला कोरसा ने कहा कि जिस दौर में बस्तर में नक्सलवाद का प्रभाव बेहद व्यापक था, उस समय ग्रामीणों के सामने भय, दबाव और मजबूरी जैसी परिस्थितियां थीं। ऐसे में सभी आरोपितों की भूमिका को एक समान मानने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति की वास्तविक भूमिका और परिस्थितियों का अलग-अलग परीक्षण किया जाना चाहिए।
उन्होंने सरकार और संबंधित कानूनी संस्थाओं से अपील करते हुए कहा कि मामले के मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया के तहत सजा पर पुनर्विचार किया जाए। उन्हाेंने कहा कि परिजनों का आरोप है कि जिन बड़े नक्सली नेताओं के दबाव में ग्रामीण संगठन के साथ रहने के लिए मजबूर हुए वे अब आत्मसमर्पण कर चुके हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं। वहीं दूसरी ओर छोटे कैडर और ग्रामीण वर्षों से जेल में बंद हैं। उनका उद्देश्य झीरम घाटी जैसे हमले की गंभीरता को कम करना नहीं है, बल्कि वे चाहते हैं कि जिन लोगों को सजा सुनाई गई है, उनकी व्यक्तिगत भूमिका, परिस्थितियों और मामले में वास्तविक भागीदारी को अलग-अलग देखा जाए।
झीरम घाटी हमले के चश्मदीद और पूर्व कांग्रेसी नेता अजय सिंह ने भी एनआईए अदालत के फैसले को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को आरोपित बनाकर फांसी की सजा सुनाई गई है, उनमें कोई बड़ा नक्सली नेता नहीं है। उनका कहना है कि घटना के कथित बड़े जिम्मेदार लोगों में से कुछ बाद में आत्मसमर्पण कर चुके हैं और उनके संबंध में अलग परिस्थितियां सामने आई हैं। ऐसे में छोटे कैडर या ग्रामीणों को लंबे समय तक जेल में रखने के बाद मृत्युदंड देना उचित है या नहीं, इस पर सरकार और न्यायिक प्रक्रिया के स्तर पर फिर से विचार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि झीरम घाटी की घटना बेहद गंभीर थी और उसमें जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ था, लेकिन सजा तय करते समय प्रत्येक आरोपित की व्यक्तिगत भूमिका को स्पष्ट रूप से सामने रखना भी जरूरी है। उनके मुताबिक इसी आधार पर एनआईए अदालत के फैसले के सभी पहलुओं पर आगे की कानूनी प्रक्रिया में विचार किया जाना चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे