जैन पांडुलिपियां भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा और संस्कृति का उत्कृष्ट उदाहरण : अरुण कुमार
नई दिल्ली, 25 अगस्त (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार ने कहा कि जैन पांडुलिपियां और प्राकृत भाषा में लिखा गया जैन साहित्य भारत की सभ्यता, संस्कृति और प्राचीन ज्ञान प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी दुर्लभ ज्ञान संपदा का संरक्षण आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भारत की समृद्ध ज्ञान-विरासत से परिचित हो सकें।
अरुण कुमार ने यह बात यहां जैन भवन में शहजाद राय शोध संस्थान, बड़ौत द्वारा आयोजित ‘विरासत’ जैन पांडुलिपि एवं साहित्य प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर कही। प्रदर्शनी में संस्थान में संरक्षित प्राचीन जैन पांडुलिपियों और दुर्लभ जैन साहित्य को प्रदर्शित किया गया है।
उन्होंने कहा कि शहजाद राय शोध संस्थान द्वारा संरक्षित पांडुलिपि संपदा अत्यंत दुर्लभ और प्रेरणादायी है। उन्होंने इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. अमित राय जैन के प्रति आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि जैन साहित्य केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इसमें भारत के दर्शन, भाषा, कला, इतिहास और प्राचीन ज्ञान-परंपरा से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री भी उपलब्ध है। प्राकृत भाषा में संरक्षित साहित्य भारतीय सभ्यता के विभिन्न पहलुओं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता ऑल इंडिया श्वेतांबर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अतुल जैन ने की। इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री सुरेंद्र जैन, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के निदेशक आशुतोष भटनागर, आरएसएस केंद्रीय टोली के सदस्य मुकुल कानिटकर, ऑर्गनाइज़र वीकली के मुख्य संपादक प्रफुल्ल केतकर सहित जैन समाज के अनेक विद्वान, बुद्धिजीवी और गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
देश के विभिन्न राज्यों से आए विद्वानों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया। उन्होंने प्रदर्शित दुर्लभ पांडुलिपियों और प्राचीन ग्रंथों को भारतीय ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य संपदा बताया। विद्वानों ने कहा कि इन पांडुलिपियों में दर्शन, भाषा, संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण तथ्य और ज्ञान निहित हैं।
प्रदर्शनी के माध्यम से यह संदेश भी दिया गया कि जैन पांडुलिपियां भारत की बहुआयामी ज्ञान-विरासत का महत्वपूर्ण स्रोत हैं और इनके संरक्षण से आने वाली पीढ़ियों तक प्राचीन भारतीय ज्ञान एवं सांस्कृतिक परंपरा को पहुंचाया जा सकता है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार