(लीड) भारत का लोकतंत्र पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शक : ओम बिरला
-लोकसभा अध्यक्ष ने केंद्रीय विधानसभा की कार्यवाहियों के 89 खंडों और त्रैमासिक पत्रिका ‘विधान-चेतना’ के प्रवेशांक का किया लोकार्पण
नई दिल्ली, 28 मई (हि.स.)। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि भारत का लोकतंत्र दुनिया के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है। यह अपने संवाद, सहभागिता और संवैधानिक मूल्यों की समृद्ध परंपराओं के माध्यम से वैश्विक स्तर पर राष्ट्रों को प्रेरित कर रहा है।
दिल्ली विधानसभा के ऐतिहासिक कक्ष में गुरुवार को केंद्रीय विधान सभा (1924-1930) की कार्यवाही के 89 खंडों और त्रैमासिक पत्रिका 'विधान-चेतना' के प्रथम अंक के लोकार्पण के मौके पर उन्होंने विचार व्यक्त किए।
यह कार्यक्रम दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता की अध्यक्षता में आयोजित हुआ जिसमें संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू भी शामिल हुए। इस मौक पर दिल्ली के विधायी कार्य मंत्री प्रवेश साहिब सिंह, दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट, विधायक, दिल्ली विश्वविद्यालय के कई प्राध्यापक और शिक्षक मौजूद रहे।
लोकसभा अध्यक्ष ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इस बात पर विशेष बल दिया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की वास्तविक शक्ति जागरूक संवाद, तथ्य-परक चर्चा और सक्रिय जनभागीदारी में निहित है। उन्होंने कहा कि भावी पीढ़ियों में लोकतांत्रिक चेतना को सुदृढ़ करने के लिए भारत की संसदीय विरासत का संरक्षण और गहन अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि दिल्ली विधान सभा का यह ऐतिहासिक भवन भारत की लोकतांत्रिक चेतना, संसदीय परंपराओं और हमारे स्वतंत्रता संग्राम का एक जीवंत प्रतीक तथा गौरवशाली विरासत है। इस परिसर के ऐतिहासिक महत्व को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि इस भवन ने भारत के संसदीय लोकतंत्र के प्रारंभिक कालखंड को देखा है। यह एक ऐसा ऐतिहासिक मंच रहा है, जहां देश के स्वतंत्रता सेनानियों और महान राष्ट्रीय नेताओं ने प्रतिनिधित्व, नागरिक अधिकारों और स्वशासन के लिए अपनी मुखर संवैधानिक मांगें उठाई थीं।
केंद्रीय विधानसभा के प्रथम भारतीय अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल के अतुलनीय योगदान का स्मरण करते हुए बिरला ने कहा कि उन्होंने संसदीय शिष्टाचार, निष्पक्षता और अध्यक्ष पद (आसंदी) की गरिमा की एक सुदृढ़ नींव रखी थी। औपनिवेशिक शासन के अत्यंत कठिन समय और भारी दबाव के बावजूद, पटेल ने इस विधायी संस्था की स्वायत्तता और प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखा। उनका यह योगदान देश भर के पीठासीन अधिकारियों और विधि निर्माताओं को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।
लोकसभा अध्यक्ष ने जोर देकर कहा कि केवल तर्क, गंभीरता और तथ्यों पर आधारित चर्चा ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को सुरक्षित रख सकती है और सार्वजनिक विश्वास को सुदृढ़ कर सकती है। उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति का मूल आधार सदैव चर्चा, आम सहमति और गहन विचार-विमर्श रहा है। अतः संसद और राज्यों की विधान सभाओं को सदैव देश की जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला सर्वोच्च मंच बने रहना चाहिए।
केंद्रीय विधानसभा की कार्यवाही के प्रकाशन को ऐतिहासिक कदम बताते हुए बिरला ने आशा व्यक्त की कि यह संकलन आने वाली पीढ़ियों के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय मर्यादाओं के एक मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ के रूप में कार्य करेगा। त्रैमासिक प्रकाशन विधान-चेतना की सराहना करते हुए बिरला ने इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण बौद्धिक प्रयास बताया, जो संसदीय अध्ययनों, विधायी शोध और लोकतांत्रिक जागरूकता को और अधिक सशक्त करेगा।
संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कि यदि विधायी संस्थाएं कमजोर होंगी तो लोकतंत्र भी कमजोर होगा। संसद और विधानसभाओं की गरिमा की रक्षा करना प्रत्येक जनप्रतिनिधि की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि दिल्ली विधानसभा का इतिहास स्वयं संसद के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है क्योंकि यह भवन कभी केंद्रीय विधानसभा के रूप में कार्य करता था और भारत की संसदीय यात्रा में इसका विशेष स्थान रहा है। उन्होंने कहा कि यद्यपि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, फिर भी राष्ट्रीय राजधानी में स्थित होने के कारण दिल्ली विधानसभा की संस्थागत भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि संसदीय कार्यवाहियां किसी भी युग की वास्तविक परिस्थितियों और राष्ट्र की स्थिति को समझने का सबसे प्रामाणिक माध्यम होती हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 1857 की क्रांति की चेतना को दिल्ली में विशेष स्थान प्राप्त है और इसी कारण यह कार्यक्रम ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। वर्ष 1924 से 1930 तक की विधायी कार्यवाहियों के संकलन और प्रकाशन का उल्लेख करते हुए उन्होंने केंद्रीय विधानसभा की अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का स्मरण किया। विजेंद्र गुप्ता ने जानकारी दी कि वर्तमान ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण परियोजना के अंतर्गत अब तक 407 बैठकों से संबंधित लगभग 32,000 संसदीय प्रश्नों का संकलन किया जा चुका है तथा दीर्घकालिक लक्ष्य लगभग पांच लाख विधायी अभिलेखों को शोध एवं सार्वजनिक उपयोग हेतु संरक्षित करना है।
मंत्री प्रवेश साहिब सिंह ने कहा कि जब प्रामाणिक दस्तावेज और तथ्य जनता के सामने आते हैं, तब इतिहास को कोई विकृत नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक उपेक्षित और विस्मृत पड़े अभिलेखों एवं कार्यवाहियों को अब व्यवस्थित रूप से पुनर्स्थापित कर राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सेठ फतेह चंद द्वारा मात्र ग्यारह महीनों में 22 एकड़ भूमि पर निर्मित यह ऐतिहासिक भवन एक अद्वितीय स्थापत्य एवं संस्थागत विरासत है, जो आज भी मजबूती से खड़ा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव