डब्ल्यूटीओ में भारत ने मत्स्य सब्सिडी पर उठाई आवाज, छोटे मछुआरों के हितों की वकालत
याउंडे, 29 मार्च (हि.स.)। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने विश्व व्यापार संगठन के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में मत्स्य सब्सिडी के मुद्दे पर भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि अत्यधिक क्षमता और अधिक मछली पकड़ने की समस्या भारी सब्सिडी प्राप्त औद्योगिक बेड़ों के कारण उत्पन्न होती है, न कि भारत और अन्य विकासशील देशों के छोटे मछुआरों से।
केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, कैमरून के याउंडे में 26 से 29 मार्च तक आयोजित इस सम्मेलन में मत्स्य सब्सिडी प्रमुख एजेंडा रहा। भारत ने चरण-2 वार्ताओं के लिए मंत्रीस्तरीय निर्णय को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभाई और समानता तथा सतत विकास के सिद्धांतों पर जोर दिया।
भारत ने स्पष्ट किया कि विकासशील देशों और अल्पविकसित देशों के लिए विशेष एवं भिन्न उपचार, समान लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों तथा प्रदूषक भुगतान सिद्धांत को वार्ता का आधार बनाया जाना चाहिए। भारत ने 25 वर्ष की संक्रमण अवधि, छोटे और पारंपरिक मछुआरों के लिए स्थायी छूट, तथा औद्योगिक दूरस्थ जल बेड़ों पर कड़े नियमों की वकालत की।
गोयल ने कहा कि भारत का मत्स्य क्षेत्र खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और आजीविका प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देश में 90 लाख से अधिक मछुआरा परिवार इस क्षेत्र पर निर्भर हैं, जिनमें अधिकांश छोटे, पारंपरिक और कारीगर मछुआरे हैं, जो टिकाऊ तरीकों से मछली पकड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत न तो भारी औद्योगिक मत्स्य राष्ट्र है और न ही यहां बड़े पैमाने पर दूरस्थ जल में मछली पकड़ने वाले बेड़े हैं। भारत में प्रति मछुआरा परिवार सब्सिडी भी वैश्विक स्तर पर बहुत कम है, जो लगभग 15 अमेरिकी डॉलर सालाना है, जबकि कई देशों में यह हजारों डॉलर तक पहुंचती है।
केंद्रीय मंत्री ने भारत के संतुलित और जन-केंद्रित दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए कहा कि देश ने लंबे समय से संरक्षण के उपाय अपनाए हैं, जैसे वार्षिक मछली पकड़ने पर प्रतिबंध, जो सतत विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
भारत ने डब्ल्यूटीओ मंच पर यह भी जोर दिया कि भविष्य के निर्णय न्यायसंगत और संतुलित होने चाहिए, ताकि कमजोर और छोटे मछुआरा समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
भारत ने वार्ता के दौरान रचनात्मक भूमिका निभाते हुए कहा कि आगे के निर्णय ऐसे होने चाहिए जो समुद्री संसाधनों की रक्षा के साथ-साथ आजीविका को भी सुरक्षित रखें।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर