आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने शहरी गर्मी और प्रदूषण के लिए नया सूचकांक किया विकसित
खड़गपुर, 22 मई (हि. स.)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने शहरी तापमान और वायु प्रदूषण के संयुक्त प्रभावों का आकलन करने के लिए एक नया वैज्ञानिक ढांचा विकसित किया है। यह पहल सतत शहरी नियोजन और जलवायु-लचीले शहरों के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
“सतत शहरी नियोजन के लिए ऊष्मा एवं प्रदूषण का एकीकृत सूचकांक: दिल्ली से प्राप्त साक्ष्य” शीर्षक से प्रकाशित इस शोध का नेतृत्व आईआईटी खड़गपुर के महासागर, नदी, वायुमंडल एवं स्थल विज्ञान केंद्र के प्रोफेसर जयनारायणन कुट्टिप्पुरथ और वी. के. पटेल ने किया है। अध्ययन में “शहरी मानव प्रदूषण सूचकांक” नामक एक नई पद्धति विकसित की गई है, जो पहली बार शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव और विभिन्न वायु प्रदूषकों से उत्पन्न स्वास्थ्य जोखिमों का एक साथ समग्र मूल्यांकन करती है।
आईआईटी खड़गपुर की ओर से शुक्रवार शाम जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह शोध 21 अप्रैल 2026 को 'जर्नल ऑफ स्टडीज इन केमिकल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग' में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में बताया गया है कि अब तक शहरी मूल्यांकन प्रणालियों में तापमान और वायु प्रदूषण को अलग-अलग देखा जाता रहा है, जबकि वास्तविक स्थिति में इन दोनों का संयुक्त प्रभाव मानव स्वास्थ्य और जीवन स्तर पर अधिक गंभीर असर डालता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि तीव्र शहरीकरण, बढ़ते मानवीय उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन के चलते शहरों में गर्मी और प्रदूषण का संयुक्त प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इससे न केवल स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं, बल्कि शहरी अवसंरचना और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी नई चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं। नया सूचकांक इन संयुक्त जोखिमों का व्यापक और व्यावहारिक आकलन करने में सक्षम एक उपकरण प्रदान करता है।
दिल्ली को अध्ययन के उदाहरण के रूप में शामिल करते हुए शोध में पाया गया कि घनी आबादी और औद्योगिक क्षेत्रों विशेषकर मध्य, पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में इस सूचकांक के मान अधिक पाए गए। यह उच्च पर्यावरणीय दबाव और अधिक स्वास्थ्य जोखिमों की ओर संकेत करता है। इसके विपरीत दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली के अपेक्षाकृत हरित और कम घनत्व वाले क्षेत्रों में सूचकांक के मान कम पाए गए, जो बेहतर शहरी नियोजन की संभावनाओं को दर्शाते हैं।
अध्ययन में हरित अवसंरचना के विस्तार, सतत परिवहन व्यवस्था, औद्योगिक और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में कमी, खुले क्षेत्रों के संरक्षण, शहरी वायु प्रवाह गलियारों के विकास तथा जलवायु-संवेदनशील शहरी नियोजन रणनीतियों को अपनाने पर विशेष जोर दिया गया है।
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि शहरी नियोजन केवल तापमान या केवल प्रदूषण को ध्यान में रखकर किया गया, तो वास्तविक संयुक्त जोखिमों का आकलन अधूरा रह जाएगा।
वैश्विक स्तर पर बढ़ती जलवायु चुनौतियों और शहरी प्रदूषण को देखते हुए यह सूचकांक नीति-निर्माताओं, शहरी योजनाकारों, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पर्यावरण एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय-सहायक उपकरण साबित हो सकता है। यह ढांचा विकासशील और विकसित दोनों प्रकार के शहरों में लागू किया जा सकता है और सतत व सुरक्षित शहरी भविष्य के निर्माण में अहम भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।
-------------
हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता