मंत्र का जाप, श्रवण और मनन साधक को भीतर से रूपांतरित कर देता है: प्रो. पिका घोष

 


नई दिल्ली, 18 अगस्त (हि.स.)। अमेरिका की विलनोवा यूनिवर्सिटी (पेन्सिलवेनिया) की प्रो. पिका घोष ने मंगलवार को कहा कि मंत्र का जाप, श्रवण और मनन साधक को भीतर से रूपांतरित कर देता है।

प्रो. घोष ने यह बात आज दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में आयोजित 5वें 'आनंद ए. कुमारस्वामी मेमोरियल लेक्चर' के दौरान कही।

इस व्याख्यान का मुख्य विषय 'नामावली कांथा: बंगाल में कढ़ाई, कीर्तन और ध्यान' रहा, जिसमें उन्होंने बंगाल की वस्त्र कला और आध्यात्मिक चेतना के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया गया।

प्रो. घोष ने कहा, वस्त्रों पर मंत्रों के अंकन की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि बंगाल में नामावली चादरें (कढ़ाई, बुनाई या प्रिंटेड रूप में) केवल परिधान नहीं थीं, बल्कि वे साधक के लिए एक सुरक्षा कवच का कार्य करती थीं ठीक उसी तरह जैसे मंत्रों का मौखिक उच्चारण और श्रवण शरीर एवं मन की रक्षा करता है।

प्रोफ़ेसर पिका घोष ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर 20वीं सदी के पूर्वार्ध के ऐतिहासिक कांथा नमूनों को प्रदर्शित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुराने कपड़ों को जोड़कर उन पर एक-एक टांका लगाकर महामंत्र के अक्षरों और शब्दों को उकेरना महिलाओं की व्यक्तिगत और शांत भक्ति को दर्शाता है, जो घरेलू साधना का प्रतीक है।

कुछ कपड़ों पर मंत्रों की पुनरावृत्ति शांत ध्यान को दर्शाती है, जो सार्वजनिक कीर्तन और निजी ध्यान का संगम है।

इसके अलावा, सुई-धागे के चलने की शांत, सटीक और लयबद्ध गति सार्वजनिक कीर्तन में बजने वाले खोल, करताल, ताली और शारीरिक गतिशीलता की ऊर्जा को सूक्ष्म रूप में प्रतिबिंबित करती है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक कलाओं और वस्त्रों पर मंत्रों के उपयोग को केवल सजावटी न मानकर, उन्हें भक्ति आंदोलन और तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़कर और अधिक गहराई से अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है।

इस मौके पर आईजीएनसीए के प्रो अनिल कुमार, कला इतिहासकार, शोधार्थी और संस्कृति प्रेमी मौजूद रहे।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी